Sheher, Safar aur Humsafar : A Short Story

ट्रेन आदतन तो नहीं, लेकिन वक़्त पे थी। हमारे यहाँ की रेल गाड़ियों की भी अपनी अकड़ होती है। आप जब जो चाहते हैं उसका ठीक उल्टा करती हैं ये। आप शायद ये सोच रहे होंगे, की मैं भी क्या अजीब आदमी हूँ की जो भूली भटकी ट्रेन वक़्त पे पहुँच गयी, उसकी तारीफ़ की जगह ताने दे रहा हूँ। अब इस भावना को समझने के लिए तो आपको हमारे देश के किसी छोटे शहर के प्लेटफार्म नंबर 1 पर सुबह 3.30 बजे जाना पड़ेगा, तभी आप ये दर्द और डर समझ पाएंगे।

गाडी सुबह की थी तो पापा को कड़े शब्दों में मना कर दिया था, तकल्लुफ उठाने के लिए। वैसे तो ज़िन्दगी भर मेरी बात को काटते रहे पर आज उन्हें भी मान लेनी थी मेरी बात। बाहर निकल कर कोई फायदा नहीं था। हमारे शहरों में रात को स्टेशन के पास 2 तरह के लुटेरे मिलते हैं। एक जो हथ्यार रखते हैं और दुसरे स्टीयरिंग। जी हाँ, अगर अभी बाहर जा कर किसी टैक्सी वाले से मोल-भाव करूँ, तो शायद वो हमसे उस से ज्यादा पैसे ऐंठ ले, जितने सरकार ने ऐ. सी. थर्ड क्लास के लिए थे।

सामने एक बेंच खाली थी। वैसे खाली तो लगभग सभी बेंचे थी, पर ये सामने थी। अपने सामान को ‘नज़र के सामने और जिगर के पास’ रख कर, सोचा यहीं पे सुबह होगी। वक़्त बिताने लिए जब स्मार्ट फ़ोन निकाला, तो ख़्याल आया की एक बार वो 10 – 12 टैक्सी के एप्प्स भी देख लें, क्या पता ये शहर हमारे पीठ पीछे ही सही, तरक्की कर गया हो।

एक पीले रंग का कुछ टिमटिमा तो रहा था, क्या वाकई में इंटरनेट ने यहाँ तक संधि विच्छेद कर लिया है हमारे देश का ? आँखों पे तब भरोसा नहीं हुआ, जब Book Now पे click करने के बाद confirmation आ गयी। 12 मिनट में कोई ईशवर का दूत हमे लेने आ रहा था।

“हमारा शहर भी कितना तरक्की कर गया, नहीं?” मैंने अपने ऊपर ज़िम्मेदारी लेते हुए, बातों की शुरुआत की।
“तरक्की तो सर, अपना अपना नजरिया है।” ड्राइवर ने सामान डिक्की में डालते हुए, जवाब दिया।

“मैं तो इस app की बात कर रहा था। मैंने उम्मीद नहीं की थी की यहाँ ये काम करेगा।”
“सर, काम करने वाले तो कहीं भी कर लेते हैं।”

अपने ड्राइवर के दोनों जवाब सुन के मुझे अपनी पत्नी की बात याद आ गयी, “आप अकेले हैं, जो सुबह सुबह सूरज से भी तेज़ mood में रहते हैं। सब इस मिजाज़ के नहीं होते|

ख़ैर, सालों बाद मैं अपने शहर आया था, अपने घर आया था। मैं उसी से बातें करने लगा। Girls college वाला चौराहा, आज भी जागता है पहरेदारी में, अब तो उसने torch भी खरीद ली है। पुराना बाज़ार अभी भी किस्से बटोर रहा है मुसाफिरों के, मुसाफिरों को सुनाने के लिए। कितना कुछ बदल जाता है इतने वक़्त में, फिर भी जब आप किसी को इतने अच्छे से जानते हैं, तो लगता है जैसे की कुछ नहीं बदला।

“अरे भाई, ज़रा धीरे करना गाडी।” मेरी नज़र एक पहचान के मोड़ पर पड़ी और ऐसा लगा वो मुझे हाथ दे रहा हो।

तीन बंगलों, १ मैदान और २ झोपड़ियों के आगे मेरा स्कूल था। वो स्कूल जहाँ मेरा बचपन आज भी शरारतें कर रहा था। जहाँ से पीछे वाली दीवार फांद कर हर हफ्ते मैं आज भी अपने दोस्त के साथ सुनील शेट्टी की मसीहा देख रहा था। मेरा दोस्त!

माज़ी की तस्वीर साफ़ होती जा रही थी। मैं इसके लिए तैयार नहीं था। हाथ खुद-ब-खुद सिगरेट ढूँढ़ने लगी। होठों पे दबा के उसे जब जेबों को लाइटर की तलाश में टटोला तो चेहरा याद आया उन मिलनसार भाई साहब का जो गेट पे मिले थे और लाइटर मांगने के बाद कभी लौटाया ही नहीं। अचानक कुछ याद आया। मिश्रा जी, दूकान बंद कर के, एक चालु माचिस अपनी shutter के बाएं वाले लॉक के पास रख जाते थे, हमारे जैसे ग्राहकों और आशिक़ों के लिए।

मैं बड़ी उम्मीद ले कर पहुंचा उसी कोने में। वहां कुछ भी नहीं था। दिल टूट सा गया मेरा, ज़रा वैसा ही, जब अंजलि ने ना कहा था मुझे और मैंने सिगरेट शुरू की थी, ठीक यहीं खड़े हो कर।

” अब मिश्रा जी नहीं बैठते, उनका लड़का बैठता है, और वो lighter रखता है, कोल्ड ड्रिंक वाले फ्रिज के पीछे।”

मैं अचरज से अपने ड्राइवर को देखता चला गया। उसे कैसे पता की मैं क्या ढूंढ रहा था !

“शहर ने तरक्की की है, बदला नहीं है। शायद तुम बदल गए तरक्की के नाम पे, नवीन।”

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