Samar ka Video Game : A Short Story

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बार बार पापा मिन्नतें कर के हार चुका था समर। पापा समझते ही नहीं थे की वो वीडियो गेम कितना ज़रूरी हो गया था समर की इज़्ज़त के लिए। बस में जब अमित और निशांत कॉण्ट्रा के बारे में बातें करते, तो उसे चुप हो जाना पड़ता था। पिछली गर्मियों की छुट्टी में जब निशांत को उसके नाना जी ने वीडियो गेम दिलाया था, तब से सब उसकी ही बातें करते थे। अमित ने भी ज़िद पकड़ कर, अपने जन्मदिन में अपने पापा से सेगा का वीडियो गेम खरीदवा लिया था।

मिडिल क्लास में भी तीन क्लास होते हैं: अपर मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास और मिडिल – मिडिल क्लास। इस समीकरण का सबसे चुनिंदा नमूना होता है एक प्राइवेट स्कूल। यहाँ तीनो श्रेणियों के बच्चे आते हैं। और बच्चे होने के नाते, वो दोस्ती करने से पहले सामने वाली की हैसियत नहीं परखते। समर के दोनों दोस्त, अमित और निशांत अपर मिडिल क्लास वाले थे। समर के पिताजी, समर को ना तो ये समीकरण समझा पाते थे और ना ही अपनी मजबूरी। हर बार जब वीडियो गेम की बात निकलती तो या तो गुस्सा हो जाते या तो गोल-मोल कर बात को खा जाते।

समर भी काम समझदार नहीं था। पापा के स्वभाव को भांप चुका था पर निश्चय भी कर चूका था, की चाहे जो हो जाए इस दशहरे के पहले वो वीडियो गेम खरीद के रहेगा। मम्मी से उसने डील की थी, की अगर उसके पास वीडियो गेम लेने के लायक पैसे जमा हो गए, तो मम्मी या पापा उसे वीडियो गेम खरीदने से मना नहीं करेंगे। जिस दिन से ये deal हुई थी, उसके बाद से घर आने वाले हर रिश्तेदार से उम्मीद रखी जा रही थी, की जाते जाते आशीर्वाद के साथ कुछ पैसे भी दे कर जाएँ। पहले जिनके आने पे अपने गाल छुपाए घूमता था, अचानक से वो मंझली मौसी उसकी favourite हो गयी थी।

एक दिन पता नहीं क्या याद करते करते, माँ से पूछ लिया उसने, “माँ, बहुत दिन हो गए न, दिल्ली वाले फूफा जी नहीं आये।”
माँ ने समझ तो सब लिया था, पर मुस्कुरा भर कर छोड़ दिया।

Exams बीतें, गर्मियों की छुट्टियां बीतीं। अब गुल्लक में सिक्के डालने पर मिट्टी से टकराने की नहीं बल्कि दुसरे सिक्कों और नोटों से टकराने की आवाज़ आती थी। हर रात सोने के पहले एक बार गुल्लक के दर्शन होते थे और बाकायदा चेकिंग होती थी, की आज का भार कल के बराबर है की नहीं या फिर मम्मी ने किसी काम के लिए, compass लगा कर change निकाल लिया।

अगले दिन से दसहरे की छुट्टियां शुरू होने वाली थी। वो दिन आखिर कार आ चूका था, जब वो पापा के साथ बाज़ार जा कर अपना वीडियो गेम ले आएगा। आज रात को ही उसने मम्मी से वादा ले लिया था, की कल उसे एक बार भी पढ़ाई के लिए नहीं टोका जाएगा। सोने से पहले एक आखिरी बार समर ने अपनी रफ़ कॉपी निकली और पिछले पन्ने पे लिखे अपने आजतक के सबसे महत्वपूर्ण बही-खाते को जोड़ने लगा। पैसे पूरे हो चुके थे, २० रुपये ऊपर ही थे। वो २० रुपये वो पापा को दे देगा, दुर्गा पूजा में पैसे बहुत खर्च होते हैं ना और वो पंडित जी तो बिना 51 रुपये लिए मानते ही नहीं। Mario, Contra, पंडित जी और दुर्गा पूजा के मेले के बारे में सोचते सोचते, उसे नींद आ गयी।

रोज़ सुबह तो मम्मी उठा देती थी, पर आज क्यों नहीं। ये समझ में आये, उस से पहले ही समर का सबसे बुरा सपना सच हो कर उसके आँखों के सामने खड़ा था। उसकी गुल्लक गायब थी। भागते और चिल्लाते हुए वो बरामदे तक पहुंचा। माँ कपडे सूखने डाल रही थी।

“माँ, मेरी गुल्लक कहाँ है?” समर ने एक सख्त थानेदार की तरह पुछा।
“ब्रश किया तुमने?” माँ ने रोज़ की तरह पुछा।
“माँ, मेरी गुल्लक कहाँ है ?” ये बात रोज़ की तरह नहीं थी।
“तेरे पापा सुबह बाज़ार जा रहे थे तो उन्हें किसी चीज़ के लिए पैसे कम पड़ गए थे, तो उन्होंने तेरा गुल्लक तोड़ दिया।”

विश्वासघात! वो भी इतना बड़ा। वो भी पापा से। समर समझ नहीं पा रहा था की वो दुखी ज्यादा है या गुस्सा। दो बड़े बड़े आँसू की बूँदें उसकी आँखों से अपने आप बाहर आने लगीं। उसने तय कर लिया था, की पापा के आते ही उनसे पूछेगा की उन्होंने ऐसा क्यों किया और उसके बाद उनसे कभी बात नहीं करेगा। ये सोचते सोचते ही पापा की मोटरसाइकिल का हॉर्न सुनाई दिया उसे। हर बार तो वो भागते भागते पहुँच जाता था उनके पास, पर आज नहीं। वो उल्टी दिशा में जाकर, अंदर सोफे पे बैठ गया और पापा का इंतज़ार करने लगा।

समर के पापा अंदर चले आ रहे थे, हाथों में चार झोले और चेहरे पे मुस्कान लिए। एक झोले में पूजा का सामान था, एक में राशन का, एक में समर के नए कपड़े और एक में सेगा का चमचमाता नया वीडियो गेम। सारा दर्द और गुस्सा जैसे एक पल में काफूर हो गया और दुसरे ही पल समर नाच रहा था ख़ुशी में।

और पीछे समर की माँ ने फिर एक बार समर के पापा से पुछा, “आपने फिर नहीं खरीदा ना अपना कुर्ता?”

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