Aakashwaani: A micro story

वैसे तो कंपनी वाले फ्लाइट की टिकट करा के देते हैं लेकिन ट्रैन के सफर का मेरे हिसाब से कोई मुक़ाबला नहीं है। जब आप सफर में होते हैं तो वक़्त रुक जाता है जैसे। वक़्त! आप एक जगह पर एक भूमिका निभा कर आते हैं और दूसरी जगह दुसरे लोग और दूसरी भूमिका आपका इंतज़ार कर रही होती है। इन दोनों भूमिकाओं के बीच आता है ये सफर, इस वक़्त आप किसी भूमिका में नहीं होते, इस वक़्त आप, आप होते हैं। और 4 घंटे की तो बात थी, इतना वक़्त तो फ्लाइट के सिक्योरिटी चेकिंग में निकल जाता है। हाँ हाँ मालूम है मैं बढ़ा चढ़ा के बोल रहा हूँ, पर ट्रैन तो मुझे बचपन से ही पसंद है ना, तो थोड़ा बचपना तो बनता है की नहीं?

खैर, ट्रैन चल पड़ी थी और वक़्त रुक गया था। मैंने अपने earphones लगा लिए, रेडियो पे गाना आ रहा था, ‘दो दीवाने शहर में, रात में दोपहर में, आबो-दाना ढूंढते हैं, एक आशियाना ढूंढते हैं’। कितना पसंद था उसे ये गाना। एक घर का सपना, उसकी बातें। कितनी बार कहा था मैंने, की ये गान भेज देता हूँ bluetooth से, लेकिन नहीं, उसे सुनना भी था तो मेरे मोबाइल से। earphone का एक हिस्सा मेरे कान में लगा कर और एक अपने। सुनती भी ऐसे थी की बिलकुल पास आ जाती थी। अनजाने में ही लेकिन गुलज़ार साब का हमारी प्रेम कहानी में अभूतपूर्व योगदान था।

गाडी रफ़्तार पकड़ चुकी थी और बारिश की बूँदों ने समां बाँध रख था। जब बारिश होती थी तो कूद के खिड़की की चौखट पे बैठ जाती थी और गाती थी ,’ कतरा कतरा मिटटी है, कतरा कतरा जीने दो, ज़िन्दगी है बहने दो ‘। खिड़की से हाथ बाहर निकाल कुछ बूँदें जमा करती और चेहरे भिगा लेती थी। ओस में धूलि हुई सुबह लगती थी तब। कितना हसीन वक़्त था वो, काश थम जाता। वक़्त!

मेरी गाडी स्टेशन पर लग चुकी थी, यादों पे पाँव रखते रखते मैं बाहर आ गया। रिक्शा वाले को मंज़िल बता कर वापस अपने सफर में खो गया। वक़्त ही तो माँगा था मैंने बस, शायद वक़्त ही नहीं था उसके पास, वरना जिसने अपना सबकुछ मुझे सौंप दिया, वो मना तो नहीं करती। रिक्शा वाले ने झकझोर कर मुझे वर्तमान में ला पटका। देखा तो सामने मेरा मकान था। काश की घर होता।

दरवाज़े पे पहुंचा तो देखा सुनहरे रंग का एक चमचमाता लिफाफा इंतज़ार कर रहा है मेरे दरवाज़े की कुण्डी में फंसा हुआ। शादी का कार्ड भेज था उसने। चौकीदार के रेडियो से एक गाने की आवाज़ आ रही थी, ‘इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज़ कदम राहें’। रेडियो को आकाशवाणी यूँ ही नहीं कहते।

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