Swarg se Jannat: A Short Story

16 साल बाद किस्मत फिर मुझे अपने शहर ले कर आई थी। वो शहर जहाँ से मेरे ही शहर वालों ने मेरे परिवार को बाहर ढकेल दिया था। उस रात हमारे साथ और भी सैकड़ो परिवार बेघर हुए थे। वैसे तो बहुत छोटा था मैं उस वक़्त, लेकिन पापा के मुंह से इतनी बार वो तारीख सुन चुका था की लगता था, मुझे भी याद हो जैसे। हाई स्कूल के टीचर थे मेरे पापा, सब उन्हें कॉल साब कह के बुलाते, नाम कोई नहीं लेता था। इज़्ज़त बहुत थी उनकी यहाँ। भीड़ इज़्ज़त कहाँ देखती है।

जब यूनिवर्सिटी ने conference के लिए बुलाया था, तो बड़ी असमंजस में था मैं। जाऊं की नहीं, कुछ समझ नहीं आ रहा था। डर अजीब चीज़ होती है। उस शहर से मेरा बचपन जुड़ा था। मेरा पहला स्कूल, वो मैदान, वो शिकारे, मेरे दोस्त! पर मुझे आज 16 साल बाद उस शहर से जुड़ा कुछ याद था, तो बस डर। सोच समझ कर, अपने डर को समझाया था और अपने आप को भी, की वो एक दौर था, आज वैसा कुछ नहीं है। जन्नत तो नहीं है, लेकिन इंसानियत तो होगी, बस यही सोच कर आ गया था मैं।

conference ख़त्म होते होते शाम हो गयी। थक तो गया था थोड़ा, लेकिन मन कहाँ मानने वाला था। टैक्सी वाले को आवाज़ दी और इस रौब से पता बताया मानो आज भी वो मेरा घर हो जैसे। सूरज ढलने लगा था, गलियां जानी पहचानी सी लग रही थी, दिमाग में फिर वही रात घूमने लगी। कुछ मेरी यादें, कुछ पापा के दोहराए – रटाये किस्से। एक सिनेमा सा बन गया था मेरे दिमाग में। कुछ बचपन के किस्से नहीं होते, जो आप कुछ जगहों से भूल जाते हैं तो उसमे अपने हिसाब से किरदार और मोड़ जोड़ देते हैं, बस वैसा ही हो गया था ये किस्सा भी मेरे लिए।

टैक्सी वाले ने मुझे टोक कर पुछा, ” साब! गली तो आ गयी, घर कौन सा है?”

दादाजी ने घर का नाम ‘स्वर्ग’ रखा था। कुछ लोग मज़ाक में मेरे पिताजी और हमें स्वर्गवासी भी कहते। लेकिन वाकई स्वर्ग से कम नहीं था मेरा घर। आगे एक छोटा सा बागीचा था और सामने ही हमारे खेलने का मैदान। शाम को खेल के वापस आता तो वहीँ बागीचे में बैठ कर बातें करते।

“यहाँ कोई बच्चों के खेलने के लिए मैदान है ना?” मैंने टैक्सी वाले से पुछा।
“हाँ, शायद है एक।”
“बस उसी के main gate के सामने वाला घर है।”

टैक्सी वाले को शायद समझ आ गया और उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी। मैं फिर से अपनी कहानियों में खो गया।

घर के पीछे की तरफ एक छोटा सा servant quarter था। वहां जुनैद रहता था। एक दिन जाने कहाँ से मिल गया था पापा को स्कूल के बाहर। काम मांग रहा था। पापा ने पैसे दिए तो उसने कहा की काम दिलवा दो साहिब पैसे तो कल ख़त्म हो जाएंगे। माँ भी बड़े दिनों से ज़िद्द कर रही थी की कोई हाथ बटाने वाला चाहिए, तो पापा ने सोचा की एक तीर से दो शिकार हो जाएंगे। माँ ने कोहराम मचा दिया था पापा की इस हरक़त पर। जो जुनैद में मेरे पापा को मजबूर और सच्चा दिखाई दिया था, वही जुनैद मेरी माँ को अजनबी और मुसलमान नज़र आ रहा था।

पापा की ज़िद्द और माँ की मजबूरी के मद्देनज़र जुनैद no man’s land यानि servants quarter में रखा गया था और kitchen छोड़ कर बाकी जगहों में अपनी योग्यता साबित करता था।

“साब, आ गया आपका मैदान।” टैक्सी वाले ने कहा।

मैंने पैसे दिए और शुक्रिया कह कर अपना घर ढूँढ़ने लगा। वो घर जिसका होना न होना एक बराबर हो गया था हमारी ज़िन्दगी में। इतनी छोटी सी ज़िन्दगी में हालात ने इतने घर बदलवा दिए थे की किस किस को दिल के करीब रखे, ये फैसला भी मुश्किल हो चला था।

होना तो यही चाहिए, मैंने सोचा। पर बाकी घरों में रौशनी है, यहाँ इतना अँधेरा क्यों है। खँडहर जैसा दिखता तो नहीं।

तभी अंदर से एक तेज़ आवाज़ आई, “फ्यूज लगा रहा हूँ, टीवी और फ्रिज बंद रखना।”
अगले ही पल रौशनी ने भर दिया घर को।मेरी आँखों से सामने एक नाम प्लेट चमक रहा था –

स्वर्ग – अनन्त राज कॉल। जन्नत – जुनैद क़ुरेशी।

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