Short Story: Bombay, Baarish aur Ek Kahaani

पिछले महीने एक साल हुए मुझे बॉम्बे में। कई बार लोगों ने टोका मुझे की अब तो यहां के बाशिंदे भी इसे मुंबई कहते हैं, तुम भी आदत डाल लो, लेकिन मैं तो मैं ही हूं। वही अड़ियल, ज़िद्दी इंसान। बचपन से ही आदत थी मेरी, दुनिया से अलग चलने की। कोई cool बनने की चाहत नहीं थी, पीछे पलट कर देखता हूं तो एक ही कारण दिखाई देता है, वो है ज़िद्द। ख़ैर कुछ आदतें हम सबकी होती हैं जो बस होती हैं, जिनका होना हमें वो इंसान बनाता है, जो हम हैं। वैसे ही होती हैं कुछ मजबूरियां।

तीन मूलभूत मजबूरियां – रोटी, कपड़ा और मकान, मुझे ले आई थी इस शहर में, जिसे लोग सपनो का शहर कहते हैं। मजेदार बात है, की कुछ लोग ये भी कहते हैं, की ये शहर कभी सोता नहीं है। सोचता हूं किसी दिन दोनों गुटों को भिड़ा दूं इस सवाल के साथ, की अगर ये शहर सोता ही नहीं है, तो ये सपनो का शहर बना कैसे? ख़ैर।

में तो इस बम्बई में सोता भी था और एक सपना भी देखता था। कभी हिम्मत नहीं हुई उस सपने से जा कर उसका नाम पूछने का। मेरी ही स्टॉप से रिकशा पकड़ती थी रोज़ सुबह। एक दिन late हो गया था ऑफिस के लिए तो दिखी थी। उस दिन के बाद में शायद ही किसी रोज़ में ऑफिस वक़्त पे पहुंचा हूंगा।

हर रोज़ घड़ी मिला कर late होता था उसको देखने मात्र को। क़ायदे से मुझे हिम्मत जुटा लेनी चाहिए थी और कम से कम एक कॉफी के लिए तो पूछ ही लेना चाहिए था। पर ना तो आप मुझे इतना जानते हैं, ना ही मेरे क़ायदों को। मेरे तरह के जो लड़के होते हैं, वो स्कूल में लड़कियों को क्या, लड़कियों से बात करने वालों लौंडो को भी पास नहीं भटकने देते। जब बड़े होते हैं तो कॉलेज भी या तो पढ़ने जाते हैं, ये फिर लड़ने। आख़िर के दो सालों में मेहनत करते हैं ताकि नौकरी लग जाए और सामाजिक व्ययवस्था पे पूर्ण भरोसा रखते हैं की वो किसी से तो शादी करा ही देंगे। हमारी ज़िन्दगी में प्यार जो होता है, वो या तो एकतरफा होता है या वो होता है जिसे लोग crush कहते हैं। crush क्या वाहियात नाम है, एक इतने खूबसूरत और निर्मल एहसास के लिए। ख़ैर।

में उसे देखता भी रहा, और वक़्त बीतता भी रहा। मौसम करवट ले रहा था, दूर दूर से बादल अपना डेरा जमाना शुरू कर चुके थे चुके थे। बम्बई की बारिश बहुत मशहूर है। ज़्यादातर इस कारण क्यूंकि मनमर्ज़ी है। ना सोमवार देखती है, ना peak time, ना उसके रिकशा पकड़ने का वक़्त। मुझे बारिश कभी से पसंद नहीं थी। बचपन में जब सारे बच्चे पानी में छप – छपाते हुए नाव चलाते, में अपनी खिड़की के बैठ के किताबें पढ़ा करता था। मैंने कहा था ना, की आप मुझे इतना जानते नहीं हैं। बचपन से जितने कारण जोड़े थे इस बारिश को ना-पसंद करने के, बम्बई आ कर एक और जुड़ गया था। दो महीने में उसे देख भी नहीं पाता था।

बारिश आ चुकी थी। बम्बई में जब बारिश आती है तो लगता है किसी वार्षिक मुक़ाबले में आई हो। ना बारिश रुकती है, ना बम्बई शहर। Lunch – time से शुरू हुई बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। लेकिन घर तो जाना था, कल वापस आने के लिए। अपना छाता और हिम्मत ले कर में रिकशा स्टैंड तक पहुंचा। कुछ मिन्नतों के बाद एक रिकशा वाले ने मुझ पर तरस खा लिया।

रिक्शे में बैठ कर बारिश को कुछ बाद-दुवाएं दी और रिकशा वाले से कहा, “भइया रास्ते में कोई हमारे स्टॉप का मिले तो बिठा लेना, आप उनसे पैसे ले लेना। आपका भी भला हो जाएगा और बारिश से त्रस्त उस इंसान का भी।”

चमचमाती सड़कों, बदलते सिग्नलों और चीखते हार्नो के बीच सफर कटना शुरू हुआ। थोड़ी दूर ही आगे बढ़े थे की एक हाथ तेज़ी से इशारा कर रहा था हमारे रिकशा को रुकवाने के लिए।

रिकशा वाले ने हमसे पूछा, “रोक दूं साहब?”

मैंने बोला, “अरे हाँ, आपको कहा तो था।”

रिकशा वाले ने रिकशा रोकी, और direction का इशारा करते हुए उस हाथ के मालिक को रिक्शा में बिठा लिया।

जब वो अंदर आई, तो ऐसा लगा की अगर आजतक इस बारिश ने हमारे लिए कुछ अच्छा किया है, तो बस यही। बारिश में भीगी ऐसी लग रही थी, जैसे सुबह की घास हो जाती है, ओस पड़ने के बाद। वो पल एक ऐसा पल था, जो शायद सब को मिलता है, लेकिन बस एक बार। वो कहते हैं ना, कायनात वाली बात, की वो साज़िश करती है, मिलाने के लिए लोगों को, ये वैसी वाली साज़िश थी।

सोचा की ‘hi’ कहूं। उसने शायद आंखों से कहा भी, मैं जवाब नहीं दे पाया। इसके पहले की हम दोनों में से कोई कुछ कहता, driver ने पूछ लिया, ” अंधेरी में कहां जाएंगी मैडम?”

” J. B. नगर।”

दोनों ने एक बार में जवाब दिया। वो मेरी तरफ देख रही थी, मुस्कुरा रही थी।

बारिश इतनी भी बुरी नहीं होती।

Comments

comments