Khaan Chacha Ki Dukaan (Part 1) – A Short Story

ऐसा लगता है जैसे की ये बात हमेशा से ही हो। ऐसी इमारतें या दुकाने जिनके ना होने के बारे में कभी ज़हन में भी नहीं आता। हर शहर की अपनी कुछ पहचानें होती हैं, कोई अड्डा होता है कहीं, कहीं कोई किराने की दूकान, और कहीं झील के किनारे एक बड़ा सा पत्थर। बस कुछ ऐसी ही थी खान साब की दूकान, मिराज क्लॉथ मर्चेंट्स। स्टेशन से निकलते ही, पहली गली से बाएं मुड़े तो बाजार चालू होता था और दूसरी ही दूकान खान साब की थी। वैसे दूकान के कानूनी मालिक तो खान साहब नहीं थे, लेकिन इस बात से ना तो बाज़ार में किसी को फर्क पड़ता था ना ही परिवार में।

दरअसल वो दूकान थी विलायत अली खान के तीसरी जमात के दोस्त, राम अवतार मिश्र की। दोस्ती तो तीसरी के बाद भी चली, खान साब की पढाई नहीं चल पायी। मिश्र जी थे तो ब्राह्मण, लेकिन उनके दादा जो थे, वो राजा के बड़े करीबी थे, तो एक तरह के ज़मींदार ही थे संपत्ति के मामले में। इतनी सारी दुकानें थी की अगर सारे में खुद ही चीज़ें बेचते तो खरीदने वाला कोई बचता ही नहीं, तो दोस्त, रिश्तेदार और अर्दलियों के बीच बाँट दी थी दुकानें। सभी अपने हिसाब से पहुंचा जाते थे किराया। सन् ’45 की बात है, खान साब ने कहा भी था राम अवतार जी को, की एक बार में बात रफा – दफा करते हैं। वो रकम चूका देंगे और दूकान अपने नाम करवा लेंगे। राम अवतार ने मज़ाक में ये कह के टाल दिया, की अभी किराया देने के बहाने महीने में एक बार चाय पे आ तो जाते हो, एक दुकान की लालच में अपना दोस्त नहीं खो सकता।

वो बात फिर उठती शायद, कभी तो। शायद खान साब ही उठाते, पर बंटवारे के वक़्त जो हुआ, उसके बाद उनकी हिम्मत नहीं जुटी कभी, और ना ही ज़रुरत महसूस हुई। जब सारा देश जल रहा था, तब बेग़म मोहल्ले से रातों-रात जान बचा के खान साब पूरे परिवार के साथ मिश्र जी दरवाज़े पे खड़े थे और मिश्र जी ने बिना सोचे उन्हें छत दी थी। एक वो दिन था और एक आज का, खान साब ने कभी उनसे कपड़ो का हिसाब नहीं रखा था। चाहे वो उनके बेटों की शादी हो या फिर दिवाली के परदे, सबको पता था की कपडे खान चाचा की दूकान से ही आएँगे।

पर अब वक़्त बदल रहा था। राम अवतार मिश्र को स्वर्ग सिधारे दो बरस के ऊपर हो चुके थे। बड़े बेटे वेद प्रकाश ने व्यापार सम्भाल लिया था। सारे दुकानों का हिसाब वही देखता था। मंझले बेटे ने राजनीति में उतरने का फैसला किया था और सबसे छोटा फ़ौज में शामिल हो गया था।

राजनीती में हाथ आज़माते हुए मनोहर को एक दशक के आस पास हो चूका था। पिछले चुनावों में विधान सभा की चुनाव का टिकट भी मिला था लेकिन दो हज़ार मतों के अंतर से हार गया था बेचारा। इस बार भी चुनाव में टिकट मिलने की पूर्ण सम्भावना थी और इस बार ना तो मनोहर लाल मिश्र और ना ही उनकी पार्टी कोई चांस लेने के मत में थी। पिछले चुनाव में उसकी पार्टी ने बस इशारा भर किया था की वो हिन्दुओं की हितैषी है; इस बात पे ही लोगों ने उसे मतों से लाद दिया था। इस बार तो एजेंडा भी खुल के सामने था।

नारा था, “सनातन धर्म को लाएंगे, भारत को बचाएंगे।”

राम अवतार के ज़माने से ही उनका परिवार समाज के कुछ सबसे इज़्ज़तदार परिवारों में से था। अच्छी और बुरी बात दोनों ये थी, की ये इज़्ज़त धर्म या जाती की वजह से नहीं, बल्कि राम अवतार के चरित्र और कर्मो की वजह से थी। लेकिन मनोहर ने तो एक साइड चुन ली थी। इस बार जीत की उम्मीद तो थी, लेकिन उसमे थोड़े अगर-मगर की आशंका तो थी। चुनावों में हमेशा रहती है, पर मनोहर को तो इस बार MLA बनना ही था, चाहे जो हो जाए। समीक्षाएं हुई, बैठकें हुई, पार्टी के सीनियर्स, बुद्धि-जीवियों और ज़मीनी कार्य-कर्ताओं, तीनो का एक ही सुर था – मनोहर जी को भी पार्टी की ही तरह अपना stand clear करना होगा।

‘Stand clear’ करना कोई मुश्किल काम नहीं था, बस एक ही रुकावट थी, खान चाचा की दूकान। पूरा शहर जानता था की वो दूकान थी तो विलायत अली खान की, लेकिन मालिक मनोहर लाल मिश्र का परिवार था। एक तरफ हिन्दुओं के हित की बात करने वाला नेता, दूसरी तरफ ऐसी संपत्ति कौड़ियों के भाव एक मुसलमान को कैसे दे सकता था ! ये बात मनोहर के आँखों की किरकिरी बन चुकी थी। उसने ठान लिया था, वेड प्रकाश से बात कर के, इस मुसीबत को हल करवा के ही छोड़ेगा। और उसके हिसाब से, इस मुसीबत का एक ही हल था – खान चाचा को दूकान खाली करनी पड़ेगी।

To Be Continued. Request you to leave your suggested flow in the comment box.

Comments

comments