नोटबंदी – एक कहानी

वैसे तो 8 नवम्बर की रात बहुत लोगों की, नींद के बगैर ही गुज़री थी लेकिन भागलपुर के गुप्ता जी का कारण कुछ और था। प्रोग्राम तो था की मोदी जी का सन्देश सुनते सुनते खाना खायेंगे और फिर रेडियो पर मनचाहे गीत सुनते हुए सो जाएंगे। खैर, बिजली विभाग का प्रोग्राम ज़रा अलग था। अँधेरे में candle-light डिनर किया और आधे घंटे पहले ही बिस्तर पर चले गए। रेडियो on किया तो बैटरी लंबी सांसें ले रही थी। मिस्टर और मिसेज गुप्ता बातें करते करते ही नींद में फिसल से गए।

सुबह हुई और आदतन गुप्ता जी अखबार उठाने निकले और श्रीमती जी चाय बनाने को। अभी श्रीमती जी ने पानी चढ़ाया ही था की गुप्ता जी की पुकारने की आवाज़ आयी। सुनीता जी तेज़ कदमो से हॉल में पहुंची तो गुप्ता जी ने अखबार उनकी तरफ घुमाते हुए कहा, ” कल ही ATM से 3000 रुपये निकाले थे। अब क्या करेंगे ?”

अखबार में बड़े बड़े अक्षरों में छपा था – “कालेधन की बजी बैंड। 500 और 1000 के नोट हुए बंद।”

दोनों अखबार को आश्चर्य से ताक रहे थे। तभी सुनीता जी को याद आया चाय के पानी की और वो रसोई की ओर हो चली। जाते जाते गुप्ता जी को पूरी खबर पढ़ के सारांश देने का निर्देश दे गयीं। गुप्ता जी तुरंत अखबार को खंगालने में लग गए। खबर की तफ्दीश ख़त्म ही हुई थी की चाय हाज़िर थी।

“वैसे कदम तो हिम्मत वाला है, और अच्छा ही है।” चाय की चुस्की लेते हुए गुप्ता जी ने अपनी टिपण्णी पेश की।
“क्या अच्छा है इसमें? ये तीन हज़ार जो कल लाये हो तुम, उसका क्या होगा?” सुनीता जी ने अपनी राय ज़ाहिर की।

“अरे, ये तो बैंक में जा कर बदल लूंगा मैं… देखो यहाँ तरीका बताया है।”
“लेकिन सभी तो नहीं जा सकते ना बैंक। उनका क्या जिनका अकाउंट नहीं है?”

“वो तो देखना पड़ेगा। तुम्हे भी तो कितनी बार बोला की अकाउंट खुलवा लो, पर थोड़ी सी मेहनत के लिए छोड़ रखा है आज तक।”
“अब नहीं खुलवा सकते क्या?”

“खुलवा तो अभी भी सकते हैं, लेकिन जो लंबी लाइन लगेगी बैंको के बाहर, उसका क्या? अभी किसको टाइम है तुम्हारा अकाउंट खोलने की?”
“हाँ। अब तो मुश्किल हो ही गयी है, तो झेल लेंगे।”

“अरे क्या मुश्किल! कुछ दिनों की बात है, काला धन छुपाने वालो की क्लास लगनी बहुत ज़रूरी थी।”
“अच्छा-अच्छा चलो उठो, देर नहीं हो रही ऑफिस जाने को? देश रास्ते में बदल लेना।”

मनोहर लाल गुप्ता रेलवे के कर्मचारी थे। जवानी में मौका नहीं मिला और बुढापे में ज़रुरत नहीं हुई तो कभी रिश्वत से पाला नहीं पड़ा। एक बेटा है जो डॉक्टरी पढ़ रहा है। दोनों प्राणी आराम से रहते हैं, इन्सटॉलमेंट भरते हैं और रिटायरमेंट का इंतज़ार करते हैं।

दिन की चाय के पैसे तो जेब में थे ही, और शाम की चाय की बारी तो सक्सेना साब की थी। गुप्ता जी ने अपनी जब टटोली, लंच बॉक्स उठाया, स्कूटर स्टार्ट किया और निकल पडे ऑफिस की ओर। रास्ते में देखा की बैंको के बाहर लाइन लग चुकी थी। लोग छाँव ढूंढ कर लाइनों को लंबा किये जा रहे थे। सड़क पे ट्रैफिक थोड़ा कम था लेकिन बैंको के बाहर खड़ी गाड़ियों ने जगह घेर रखी थी।

ऑफिस पहुंचे तो चारो तरफ यही चर्चा। कुछ समर्थन में उत्साहित थे तो कुछ पैसों के बिना आग बबूला। वाद विवाद का दौर ज़ोर पकड़ता उसके पहले ही साहब आ गए। तेज़ कदमो से चलते हुए अपने केबिन में चले गए। अचानक से शान्ति हो गयी ऑफिस में। तभी फाइल में मुह घुस्साये हुए ही भार्गव जी ने कहा – “अपनी तो जैसे तैसे, कट जाएगी, इनका क्या होगा जनाब – ए – आली।” और एक ठहाके के साथ ऑफिस का माहौल फिर से हल्का हो गया।

बात ऐसी थी की यूँ तो साहब बड़े अनुशाषित और ईमानदार होने का दावा करते थे लेकिन किसी से ये बात छुपी नहीं थी की इनकी नयी गाड़ी की इन्सटॉलमेंट इनके कमोड के पीछे वाले थैले से आती है। लेकिन साहब तो साहब ठहरे, उनका काम था आर्डर करना और बाकियों का काम था बिना सवाल के माने जाना। अब ये आर्डर ऊपर से लेटर में आ रहे हैं या नीचे से लिफ़ाफ़े में, ये साहब जाने।

3.30 का वक़्त हो रहा था। खाने और चाय के बीच वाली नींद काम ही नहीं करने दे रही थी। तभी साहब का सन्देश वाहक बना जवाहिर चला आया। उसका नाम तो वैसे जवाहर था लेकिन इतनी ज़ुबान ना उसकी साफ़ थी, ना उसे बुलाने वालों की। गुप्ता जी के टेबल के सामने खड़े हो कर सन्देश सुनाया – ” गुप्ता जी, साहब ने आपको केबिन में बुलाया है।”

गुप्ता जी थोड़े चौंक से गए। एक दिन में दूसरी बार बुलावा भेजा था साहब ने। खैर, साहब तो साहब है, जब मर्ज़ी बुलाएं। यह सोच कर गुप्ता जी साहब के केबिन में पहुंचे। साथ में वो टेंडर वाली फाइल उठा ली जो साहब ने सुबह पूरी करने को कही थी।

“अरे गुप्ता जी, बैठिये बैठिये।” साहब ने गुप्ता जी को comfortable किया।
“सर, क्या हुआ, कोई बात है क्या?” गुप्ता जी को मामला कुछ clear नहीं हो रहा था।

“नहीं नहीं। ऐसी कोई बात नहीं है। आपने वो फाइल complete कर ली? ”
” नहीं सर, वही कर रहा था। आपने तो कल तक मांगी थी।”

“जी हाँ। आराम से कीजिये। वो तो ऐसे ही पूछ लिया मैंने।”
“जी सर, कल तक जाएगी।”

“अच्छा, जवाहिर बता रहा था की आपका बेटा medical पढ़ रहा है?”
“जी सर, उसका बचपन से यही सपना था।”

“बहुत बढ़िया। कॉलेज सरकारी है या प्राइवेट?”
“जी प्राइवेट है। सरकारी में तो कहाँ हो पाता है आजकल एडमिशन।”

“हाँ। मेडिकल तो वैसे ही बड़ी मुश्किल परीक्षा है।”
“जी हाँ। दूसरी बार में भी सरकारी नहीं मिला तो हमने ही प्रेशर डाल के deemed यूनिवर्सिटी में एडमिशन करवा दिया।”

“अच्छा! तब तो फीस काफी लगती होगी, नहीं?”
” जी सर, अभी ही लेटर आया है, अगले महीने सालाना फीस जमा करनी है 2 लाख रुपये। loan approved है, बस चेक लेने जाना है।”

“अच्छा गुप्ता जी, एक बात कहूँ तो आप मुझे गलत तो नहीं समझेंगे?”
“नहीं नहीं सर, कहिये क्या बात है?”

“अगर आपके बेटे की फीस मैं भर दूँ तो?”
“अरे सर, आप क्यों भरेंगे। मैं manage कर लूंगा।”

“अरे सुनिये तो सही! आप वैसे भी लोन लेंगे, उसपे 13-14 % interest भरेंगे।”
“वो तो है सर।”

“हाँ तो मैं आपको दो लाख cash दे देता हूँ, बिना interest! और चुकाने की भी दिक्कत नहीं है, जब बेटे की नौकरी लग जाए तो उस से ले लूंगा।”
“सर, मैं समझ तो रहा हूँ आपकी बात। और मैं ये कर भी लूंगा। लेकिन एक दर्ख़ास्त है मेरी।”

“कहिये गुप्ता जी। संकोच मत कीजिये।”
“सर, वो हमारे ऑफिस में जो छोटू आता है ना, चाय देने के लिए। दसवी की परीक्षा है उसकी, उसके साल भर की स्कूल फीस भी आप भर दीजिये और उस से भी पैसे तभी लीजियेगा जब वो कमाने लगे।”

साहब की नज़रे नीची हो गयी। उन्हें लगा की गुप्ता जी ने उनपे कटाक्ष किया है। गुप्ता जी का ऐसा कोई इरादा नहीं था। वो खुद निहायती प्रैक्टिकल इंसान थे।

गुप्ता जी ने साहब की तरफ देखा, और कहा – ” सर, वो 2 लाख अभी लेने हैं या बाद में? मैं तो कहता हूँ की ये पैसे और छोटू की फीस आप कल एक साथ ही ले आइए।”

साहब आस्चर्य में थे।
गुप्ता जी ये सोच के मुस्कुरा रहे थे, की जो पैसे शायद कमोड के पीछे छुपे सड़ रहे थे, वो किसी के तो काम आ रहे हैं।

वापसी में गुप्ता जी दिन के वार्तालाप को दोहरा रहे थे। मुस्कुरा रहे थे। बैंको की लाईने अब एटीएम पे shift हो गयी थी। घर पहुंचे तो सुनीता जी चाय के लिए इंतज़ार कर रही थी। मुह-हाँथ धो कर दोनों चाय पीने बैठे। इस से पहले की गुप्ता जी दिन की घटना का हाल बताते, सुनीता जी शुरू हो गयी – ” आज दिन भर न्यूज़ ही चलता रहा। काफी देर तक मैंने भी देखा। जिस चैनल पे जाओ, बस यही चल रहा था।”

“हाँ, खबर ही ऐसी थी। आज ऑफिस में भी दिन भर यही चला। लंच हो या चाय का वक़्त। और तो और, हद्द तो साहब ने कर दी।”

“अच्छा वो छोडो, बात सुनो ना।”
“हाँ बोलो।”

“वो खर्चे से बचा कर ना, मैंने कुछ पैसे बचाये थे।”
“अच्छा, तो?”

“कुल 12,000 रुपये हैं, सिर्फ 500 और 1000 के नोटों में। सोचा था की सेल लगेगी तो कुछ खरीदूंगी, लेकिन अब तुम ही रख लो। बेकार होने से तो बच जाएंगे कम से कम।”
“हा हा हा! लाओ लाओ दे दो। ना जाने कहाँ कहाँ से निकलवा दिया काला धन मोदी जी ने।” गुप्ता जी की हंसी रुक ही नहीं रही थी।

रात को खाना खाते हुए न्यूज़ पे बेहेस सुन रहे थे। opposition का एक नेता चीख रहा था – “मोदी जी ने वादा किया था की सबके account में 15 लाख रुपए आएँगे। वो तो
आये नहीं, और अब हालात ये है की जो अकाउंट में थे वो निकाल नहीं पा रही है जनता। कहाँ है मोदी जी, कहाँ है वो 15 लाख?”

गुप्ता जी ने थाली उठायी और किचन में रखने चल दिए और धीमे स्वर में कह गए – “भाई, मेरे 2 लाख 12 हज़ार तो आ गए। तुम अपना देख लो।”

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