मेरे पापा का घर – एक कहानी

‘अरे पापा, आ गए आप। मैं चाय बनाने ही लगी थी।’ स्मिता ने कहते हुए माथुर साहब के हाथ से दूध का पैकेट लिया और चाय चढाने चली गयी।

‘हाँ, वो बारिश हुई न कल रात भर, तो रास्ते की हालत थोड़ी ख़राब थी, ऊपर से ये टैक्सी वाले सुबह से ही जल्दी में रहते हैं, तो थोड़ा संभल के चलना पड़ता है।

‘अरे तो क्या ज़रूरत है आपको भी हर रोज़ सुबह दूध लाने, जाने की?’ दाढ़ी बनाता हुआ, विवेक अपने पिताजी को एक बार और विफलता से समझाने की कोशिश कर रहा था।

‘हाँ, ठीक है, ठीक है। पता है मुझे, तुम्हारे शहर में सब कुछ मोबाइल और app से आ जाता है। इसी बहाने कहीं घूम तो आता हूँ मैं, थोड़ी हवा ही लग जाती है इस शरीर को।’

‘अच्छा, आप दोनों सही है। सुबह सुबह इस बात में मत पड़िये। आइए, चाय तैयार है।’ स्मिता ने विवाद शुरू होने से ही पहले शांत कर दिया।

दरअसल, ये विवाद था ही नहीं। यह एक सच्चाई थी, जो माथुर साहब क़ुबूल नहीं करना चाहते थे। वो नहीं मानना चाहते थे की उनका वो छोटा सा शहर, उनका घर, वहां अब वो कभी वापस नहीं जा सकते। वो गली जिसके नुक्कड़ पे बैठे पान वाले को बताना नहीं पड़ता था की उनके पान में क्या पड़ेगा। वो सब्ज़ी वाला, जो ताज़ी सब्ज़िया छांट के अलग रखता था हर मंगलवार को। वो घर जिसके आगे जब माथुर साहब बैठते तो महफ़िल सी लग जाया करती।

‘इसमें विवाद की क्या बात है, यह एक तेज़ शहर है, यहाँ लोगों के पास वक़्त नहीं है, पर सुविधाएं हैं।’ विवेक ने अपना मोर्चा खोल रखा था।

‘हाँ सुविधाएं तो हैं, लेकिन क्या तुम्हारा app दूध पहुँचाने के साथ साथ, सीढ़ी के नीचे रहने वाले बिल्ली के बच्चे को बिस्कुट खिलाता है?’ माथुर साहब ने तंज किया।

‘पापा, इस बात का तो मेरे पास कोई जवाब नहीं है। खैर, मेरे ऑफिस का वक़्त हो रहा है, तो मैं तो चला।’ विवेक ने टाई सँभालते हुए, तेज़ी से चाय ख़त्म की।

‘हाँ जाओ दौड़ो, अपनी सहूलियतों के पीछे। ढंग का नाश्ता तो इस शहर में कोई करता ही नहीं।’ माथुर साहब कहाँ मानने वाले थे।

‘शाम में जारी रखेंगे ये। चाय और नाश्ते पे!’ विवेक हँसते हँसते निकल गया।

***

माथुर साहब का एक और दिन यूँ ही नीरस निकल गया था। ना अखबार में कुछ नया था, ना समाचार में, और ना ही बाज़ार में। शाम को फिर से खिड़की पे बैठे हुए सूरज डूबते देखा। चाहे न चाहे उनको अपने शहर की याद आ ही जाती थी। कैसे हर शाम वो या तो फुचके वाले को, या चनाचूर बेचने वाले को रोक लेते और मोहल्ले के बच्चों की पिकनिक हो जाती। यहाँ तो अपना पोता ही आधे दिन स्कूल में रहता और बाकी आधे दिन कोचिंग क्लास में।

‘स्मिता, एक कप चाय पिला दो यार। मज़ा आ जाए।’ विवेक ने जूते खोलते हुए आवाज़ लगायी।

‘हाँ लाती हूँ। पापा भी तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे।’ स्मिता कहते हुए रसोई में चली गयी।

माथुर साहब भी धीरे कदमो से आ कर सोफे पर बैठ गए। चाय परोसी गयी। बिस्किट और बातों का सिलसिला शुरू हुआ।

‘पापा, गणेश पूजा आ रही है, बुधवार को छुट्टी मिल रही है ऑफिस में, अगले हफ्ते।’ विवेक ने बात छेड़ी।

‘अच्छी बात है ये तो, इस बार लेकिन दर्शन को मैं पंडाल नहीं जाऊँगा, बहुत भीड़ होती है, मुझे घबराहट सी होने लगती है।’ माथुर साहब पिछले साल के अनुभव से अभी उबरे नहीं थे।

‘अरे वो नहीं, मैं सोच रहा था की घर चलते हैं इस बार। मैं तत्काल में टिकट ले लेता हूँ, सब का मन बदल जाएगा थोड़ा और आप भी तो बड़े दिनों से कह रहे थे।’

‘हाँ, कह तो रहा था मैं, लेकिन ऐसे अचानक? कुछ बात है क्या?’ माथुर साहब असमंजस में थे। जिस बात का रट्टा उन्होंने साल भर लगाया था, वो अर्ज़ी आज अचानक मंज़ूर हो गयी थी।

‘नहीं बात ऐसी कुछ नहीं है। ऐसे ही बहुत दिन हो गए हम सब को कहीं गए हुए, तो सोचा की ये प्लान बना लूँ। आप चलेंगे ना?’
‘हाँ, चलेंगे क्यों नहीं। तुम टिकट का देख लो।’

माथुर साहब तो अंदर से बहुत खुश थे। वापस अपने मोहल्ले में जा रहे थे, अपनी गली में, अपने नुक्कड़ के नज़दीक, अपने लोगों में, अपनी शाम बिताने। लेकिन विवेक का agenda कुछ और था। आज ऑफिस में कुछ साथी खुर्राना बिल्डर्स की नयी site की बात कर रहे थे। spacious 3BHK फ्लैट और साथ में दो कमरों में balcony भी। society में ही बच्चो के खेलने का पार्क और tennis court भी था।

विवेक बहुत दिनों से सोच रहा था किसी नयी society में शिफ्ट होने का, लेकिन मुंबई के property rates इतने ज़्यादा थे की एक घर की emi चली जाए, वही बहुत था। पर आज मानो उसको अपने सपनो का घर मिल गया हो। थोड़ा हिसाब लगाया तो समझ आया की अभी जिस फ्लैट में वो रह रहा है, उसकी EMI तो उस फ्लैट के किराए से ही चली जाएगी, और नए फ्लैट की emi भी लगभग बराबर ही बैठ रही है। फ़िक्र है तो बस downpayment की।

बस इसी down payment के लालच का नतीजा था ये प्लान। विवेक ने सोचा की वैसे भी उस पुराने घर में कोई रह रहा नहीं है। बेकार में ही caretaker का पैसा भी जा रहा है और maintain करने का खर्चा अलग। इस बार दो-चार property broker से मिल के, मकान को बेचने का process शुरू कर देगा।

***

‘अरे साहब, आइए आइए।’ राम निवास तेज़ कदमो से आया और विवेक के हाथ से सूटकेस लेने लगा।

राम निवास, माथुर साहब के ऑफिस का peon था और आजकल इस पुराने घर का caretaker और निवासी भी।

‘और राम निवास, कैसा चल रहा है सब?’ माथुर साहब ने अधिकार के साथ पुछा। विवेक माथुर साहब के पीछे खड़ा था, आखिर माथुर साहब ‘घर’ आ गए थे। माथुर साहब वापस मालिक बन गए थे।

‘बस साहब, सब कृपा है।’ राम निवास ने एक पुराने मुलाज़िम की भाषा में जवाब दिया।

आगे वाले कमरे में सब चाय पीने बैठे। राम निवास, हवेली राम के समोसे ले आया था।बातों में वक़्त बीत रहा था। माथुर साहब को लग रहा था की कितने शामों के बाद वो दफ्तर से घर पहुंचे थे।

शाम तक मोहल्ले में खबर फ़ैल चुकी थी। बात ऐसी नहीं थी की माथुर साहब कोई celebrity थे, वो बस अपने थे। मोहल्लों में ना, सब अपने होते हैं।
लोगों का ताता लगा रहा, कुछ चाय पे मिले, कुछ नाश्ते पे, कुछ खाने के आमंत्रण के साथ और कुछ खाने के बाद, पान की दुकान पे।

***

‘और सुमित, क्या हाल चाल?’ माथुर साहब ने सुमित से पुछा।

‘सब बढ़िया है uncle. आपलोग शादी में नहीं आये, मुझे बहुत बुरा लगा।’ सुमित ने बनावटी शिकायत की।

‘अपने दोस्त से पूछो! किसी चीज़ का समय ही नहीं है इसको।’

‘हाँ अंकल, इसकी तो अलग से खबर लूंगा मैं! ‘

‘क्या कर रहे हो आजकल वैसे, वही साई बिल्डर्स के साथ हो?’

‘ नहीं अंकल, मैंने अपना काम शुरू किया है।’ सुमित ने कहते हुए अपना कार्ड आगे किया। कार्ड पे छपा था, avenue builders.

‘ अरे वाह, ये तो बहुत अच्छी बात है।’

‘हाँ uncle, सब आशीर्वाद है आप लोगों का।’ सुमित ने विवेक की तरफ देखते हुए कहा, ‘अंकल, अब मैं निकलता हूँ।’

‘रुक मैं भी चलता हूँ। जब से आया हूँ, यहीं पड़ा हुआ, ज़रा टहल ही लूँ।’ विवेक भी सुमित के साथ हो लिया।

वैसे प्लान ही ये था। विवेक को सुमित के साथ घर का मोल-भाव करना था। दोनों दुसरे मोहल्ले के अंदर वाले पान दूकान पे पहुंचे।

‘ये पान दूकान अभी भी है! मुझे तो शक था, सच कह रहा हूँ।’ विवेक ने अपनी सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

‘अरे अपने मोहल्ले के दम पे ही चल रहा है। सारे लड़के अपने माँ-बाप से छुप के यहीं सिगरेट पीने आते हैं।’

दोनों ने अपने कश भरे और हंसने लगे।

‘क्या हुआ? फ़ोन पे तू कुछ ज़रूरी बात का बोल रहा था।’ सुमित ने बात शुरू की।
‘हाँ यार, थी तो सही।’

‘हाँ तो बोल ना! मुझसे क्या छुपा रहा है?’
‘यार छुपा नहीं रहा। बात ही बड़ी बेतुकी लग रही है।’

‘अरे ऐसा क्या हो गया तुझे? सब ठीक तो है?’
‘ हाँ हाँ सब ठीक है यार।’

‘तो बोलेगा मेरे भाई!’ सुमित के सब्र का बांध टूटने को आ चूका था।

‘यार, मुंबई में एक फ्लैट देखा था। सच बोलूं तो इन दस सालों में पहला फ्लैट जो पसंद भी था और हैसियत में भी। दिक्कत बस downpayment की थी। हिसाब किया तो लगा की ये मकान बेच के downpayment हो जाएगा। सोचा की तुझसे deal कर लूंगा, दोनों का काम हो जाएगा।’ विवेक ने आखिर कर अपना दिल खोला।

‘हाँ तो ये तो सही बात है यार। दोस्त हूँ तेरा, नुक्सान नहीं करूँगा। कितना सोचा है तूने, इस मकान का?’

‘वही तो बात है यार। जब से आया हूँ यहाँ, मैं बस पापा को देख रहा हूँ। मुझे याद भी नहीं है की मैंने उनको इतना खुश आखिरी बार कब देखा था। ना घुटने के दर्द की शिकायत पेश हुई है, ना बदहज़मी की।’

‘तो फिर?’

‘मैं सोचता था की हमारा एक मकान खाली पड़ा है, असलियत ये आज भी मेरे पापा का घर है।’

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