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बिना ज्ञान वाला Republic Day पोस्ट

26 जनवरी, Republic Day, गणतंत्र दिवस। बचपन में कई सालों तक मुझे ये दिन समझ में नहीं आता था। ऐसा नहीं था की लोगों ने समझाने की कोशिश नहीं की। मम्मी ने काफी डिटेल में समझाया – लेकिन संविधान समझना इतना आसान होता तो फिर हम वाकई में गणतंत्र नहीं हो जाते?

पापा ने बताया की राज्य सभा और लोक सभा में क्या फर्क होता है – जो की चीज़ों को और काम्प्लेक्स कर गया। Election तो फिर भी समझ गया था मैं, बिहारी होने के नाते, कुछ चीज़ें आप पैदाइशी समझ जाते हैं, लेकिन ये राज्य सभा का funda नहीं समझ आया, और दिल पर हाथ रख के, ईमानदारी से बोलूं तो आज तक नहीं समझ आया है।

टीचरों ने तो 306 शब्दों का निबंध और 160 शब्दों का informal letter भी लिखवाया, जिसके कुछ हिस्से तो मुझे आज भी याद हैं! हाँ, समझ में आया की नहीं, इस चीज़ से न हिंदी मैडम को कुछ ख़ास फर्क पड़ा था, ना ही इंग्लिश वाले सर को।

बचपन में मेरे दिमाग में गणतंत्र दिवस की छवि परवरिश के विनोद खन्ना या ज़ंजीर के प्राण की तरह थी। एक काम्प्लेक्स करैक्टर जो आपको समझ में तो नहीं आता, लेकिन होता बहुत इम्पोर्टेन्ट है। हाँ, इतना important भी नहीं होता की वो main हीरो बन जाए, क्यूंकि main हीरो तो इंडिपेंडेंस डे ही है।

बड़े दिनों बाद समझ आया की गणतंत्र दिवस हीरो नहीं, पूरा का पूरा screenplay है।

शब्दों का अर्थ समझने निकलें तो गणतंत्र का मतलब होता है, वो राष्ट्र, जहाँ की सुप्रीम पावर किसी चुने हुए, यानी elected इंसान के पास हो। वो या तो prime minister हो सकता है, या president या वैसा कुछ। हाँ, राजा नहीं हो सकता। खैर ये आखिरी वाली लाइन भी अभी तक कई लोगों को नहीं समझ आयी है।

जहाँ तक मुझे याद है, मेरे घर में गणतंत्र दिवस मानाने का तरीका हमेशा से एक जैसा ही रहा है। झंडा फहराना, झंडे को सलामी दे कर जन-गण-मन जाना और उसके बाद टीवी पर परेड देखते देखते जलेबियाँ खाना। परेड ख़त्म होने के बाद, DD 1 पर ही फ़िल्में आती थी – हकीकत, पूरब और पश्चिम, शहीद भगत सिंह। कुछ सालों बाद उस लिस्ट में बॉर्डर, तिरंगा, और सरफ़रोश भी जुड़ गयीं और DD 1 से उठ कर हम ज़ी सिनेमा और स्टार गोल्ड पर आ गएँ।

मज़े की बात है, की इतने सालों में, ये चैनल बदले हैं और टीवी पर झंडा फहराने वाले चेहरे। लेकिन उन चैनल पर आने वाली फ़िल्में बहुत नहीं बदली, ना ही बदला है ये गणतंत्र और ना ये गणतंत्र दिवस।

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