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Sunday वाला Blog #1: Sunday वाली Category

बहुत देर तक Netflix, Hotstar, और Amazon Prime की ख़ाक छानने के बाद भी, मैं अब तक तय नहीं कर पाया था, की आखिर देखना क्या है। वैसे तो उम्मीद कम ही रखता हूँ मैं TV से आजकल, लेकिन थोड़ी उम्मीद बचा कर, मैंने TV चालू कर दिया। देखा तो स्टार गोल्ड पर चुपके चुपके आ रही है और ज़ी सिनेमा पर जो जीता वही सिकंदर। बस, फिर क्या, हो गया संडे का प्रोग्राम fix.

वैसे देखा जाए, तो संडे का अपना एक genre, अपनी एक category होनी चाहिए, नहीं? मतलब टेस्ट मैच का चौथा दिन, कुमार सानू के गाने, जो जीता वही सिकंदर जैसी फिल्में, आलू गोबी मटर की सब्ज़ी, रोज़ के मुक़ाबले बड़े वाले कप में मिली चाय, अखबार के बीच के पन्ने – इन सबों को एक category में डालना हो, तो उसे संडे ही कहेंगे न?

तो ऐसा क्यों नहीं है, की technology के इतने आगे बढ़ जाने के बाद भी, हम बस इतना नहीं कह सकते, की कुछ संडे वाला चला दो। किसी भी बुकस्टोर में वो शेल्फ क्यों नहीं है, जहाँ वो किताबें मिले, जो खिड़की की रौशनी में, बिस्तर के दूर वाले साइड पे, संडे को पढ़ा जाए?

बस, इसी दुविधा को थोड़ा कम करने की कोशिश है ये ब्लॉग, Sunday वाला Blog. हर संडे, 4 बजे, मैं इस ब्लॉग के ज़रिये कुछ ऐसा शेयर करूँगा, जो मुझे अपने संडे में ले जाता है।

वो बातें किसी भी मोहल्ले की हो सकती है, और किसी भी मोहल्ले की नहीं। सरासर झूठ भी हो सकती हैं, लेकिन थोड़ा सच तो होंगी ही, चाहे जितनी भी झूठी हों।

मैं कोशिश करूँगा, की हर किस्सा, कहानी, ब्लॉग आपको अपने संडे की तरह लगे, और मैं कोशिश करूँगा की वो मेरे संडे की तरह लगे। मैं अपना संडे लिखूंगा, और आप बताइयेगा, की क्या आपको मेरा संडे, अपने संडे की तरह लगा क्या?

और हाँ, इस हफ्ते के लिए – ये तीन छोटी सी कवितायेँ, आज वाले Sunday के नाम।

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