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Sunday wala Blog # 10: Sunday wali Raddi

“दो महीना हो गया बोलते बोलते, एक फ़ोन नहीं बदला रहा मेरा। बोले थे की ये वाला बेचना है, वो भी नहीं बेच रहे!” मेरी माँ ने जैसे ही ये कहा, मैं सीधा फिसल कर अपने बचपन के अप्रैल – मई एक किसी संडे में पहुँच गया।

“दो हफ्ते से आप टाल रहे हैं, इतना रद्दी जमा हो गया है, देख रहे हैं?” मेरी माँ, मेरे पापा को कर्त्वबोध का एहसास कराते हुए कहती थी।

रद्दी बेचना छोटे शहरों में एक काम नहीं, प्रयोजन होता है। औरतें इस प्रयोजन बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना तो चाहती हैं, परन्तु रद्दी वाले के द्वारा ठगे जाने के निश्चितता को देखते हुए, ये काम घर के पुरुष अपने कंधो पर लेते हैं। काश की वो भी समझ पाते, की ठगे वो भी बराबर मात्रा में जाते हैं, बस उनसे सवाल करने वाला कोई नहीं बैठा होता।

वैसे तो हर संडे को मैं अपने बचपन वाले संडे की तरह ही जीना चाहता हूँ, पर आज इस nostalgia trip के sponsor हैं Cashify – नए ज़माने की रद्दी खरीदने वाली कंपनी। जी हाँ, रद्दी का भी start-up है। दरअसल कुछ दिनों से मेरी माँ का फ़ोन, मेरी माँ की मर्ज़ी से कम और अपनी मर्ज़ी से ज्यादा चल रहा था। कुछ दिनों तक तो मम्मी को समझ नहीं आया, उनको लगा की स्मार्ट फ़ोन थोड़ा और स्मार्ट हो गया है। मगर जिस दिन उस फ़ोन ने मम्मी से बिना पूछे, मौसी का फ़ोन काट कर फुआ को लगा दिया, उस दिन से ही उस smart-er फ़ोन की उलटी गिनती शुरू हो गयी थी।

मेरी माँ मेरे पापा के पीछे पड़ी थी की इस फ़ोन को बेच कर कुछ पैसे मिल जाएंगे, उस पैसे से उनका पुराना Nokia ठीक करवा लेंगे। और बाकी पैसों का देखते हैं क्या होता है।

मम्मीयों की ये वाली strategy काफी पुरानी है। पापा को एक बड़ा account बता दो जहाँ ये पैसे खर्च होंगे, बाकी को इतने छोटे accounts में बाँट दो की उनका हिसाब न पूछा जा सके।

अखबार, गृहशोभा, सरिता, पुरानी किताबें, कॉपियां, सब बेच कर कुछ 200-250 रूपए जमा हो जाते थे। ये तो संडे सुबह तक हो जाता था, उसके बाद बाकी का पूरा दिन इस चर्चा में जाता की इतने पैसों का किया क्या जाए?

ये पैसे ख़ास होते हैं, मलाई की तरह। आपने दूध तो दूध के लिए खरीदा था, और दूध के ही पैसे दिए थे, मलाई तो ऊपर की कमाई है।आपने इसका बजट नहीं बनाया होता। और एक मिडिल क्लास परिवार में, बजट के ऊपर की मलाई, जब सेविंग के पंजों से बच जाती है, उसका मज़ा ही अलग होता है।

अब ये जो पैसे बचते, उस में हर सदस्य को दिवाली मनानी होती। मम्मी को नए वाले cushion covers चाहिए होते थे, मुझे disney land की सस्ती नक़ल वाले मेले में जाना होता था, और पापा को वो पैसे हम दोनों की फ़िज़ूलख़र्ची से बचाने होते थे।

Cashify वाला लड़का आ चूका था, वो फ़ोन का ऊपर नीचे, आगे पीछे, सीधे तिरछे और 43 अलग अलग एंगल से परीक्षण करने लगा। मुझे लगा ये भी मेरे बचपन वाले रद्दी वाले की तरह बोल पड़ेगा, “ये कॉपी के कार्डबोर्ड को कुछ पैसा नहीं मिलेगा, सिर्फ पेपर को मानते हैं हम।”

शुक्र था की फोन सारी कसौटियों पर खरा उतरा था और लड़के ने फ़ोन को पसंद किया था। मुझे महसूस हुआ की इतनी परीक्षाओं के बाद, आज ये लड़का क्या, उस फ़ोन को लड़के वाले भी देखने आते तो पसंद कर जाते।

फोन के बदले 3000 रुपये आये थे। 3000 जो की न बजट में थे, न सेविंग में जाने थे।

मैंने कहा, “सिनेमा देखने चलते हैं!”

माँ ने कहा, “अरे नए cushion cover लेने हैं कितने दिनों से!”

पापा ने अखबार के पीछे से तंज़ किया,”तुम लोगों की फ़िज़ूलख़र्ची कभी ख़त्म नहीं होगी!”

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