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Sunday wala Blog # 11: Mummy Ka Sunday

“मेरा संडे नहीं है क्या? आप लोगों का ही संडे है?”, मम्मी ने लगभग झुंझलाते हुए कहा।
“अरे, तुम्हारा तो हर रोज़ ही संडे होता है!” पापा ने बड़ी सहजता से, हमेशा की तरह चुटकी लेते हुए कहा।

हर रोज़ संडे होना! ख्वाब जैसा ही है। झूठ नहीं बोलूंगा, बहुत सालों तक मुझे भी यही लगता था – मम्मी का तो हर दिन ही संडे होता है।

मुझे याद है, जब पहली बार स्कूल का कोई फॉर्म भर रहा था मैं। पहले तो पापा भर दिया करते थे, लेकिन उस बार किसी कारण से मैं भर रहा था। name, father’s name, mother’s name भर दिया। Father’s occupation भी भर दिया, अटका मैं mother’s occupation पर जा कर। उस दिन के पहले मैंने सोचा ही नहीं था, की मम्मी का occupation क्या है!

मम्मी का कोई ऑक्यूपेशन भी होता है क्या? फॉर्म में तो housewife लिख दिया था, लेकिन कुछ ख़ास समझ नहीं आया था। housewife तो किसी बड़े MNC के HR डिपार्टमेंट वाले बनाते हो, ताकि employee से काम भी निकाल लिया जाए, पैसे भी बढ़ाने न पड़े और employee को भी लगे की वो //वैल्यूड है।

“चाय नहीं बानी है अभी तक? रुको मैं ही बना देता हूँ।” पापा ने एक अच्छे पति होने के नाते मदद करने का प्रस्तावना तो दिया, लेकिन इस एहसास के साथ, की ये काम उनका तो नहीं है, ख़ास कर संडे को।

“अरे, मैं बना देती हूँ, बस ये कपड़े निकालने लगी थी।” मम्मी ने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा। मजबूरी यूँ, की संडे सुबह की चाय तो मम्मी की ही ड्यूटी होनी चाहिए, इसका एहसास मम्मी को भी था।

मम्मी के तो सातों दिन संडे होते हैं – उनमे से एक दिन होता है, जो हमारा भी संडे होता है। हमारा स्पेशल संडे! जो की आज था।

आज हम रोड ट्रिप पर जा रहे हैं – road trip, grown ups का पिकनिक होता है। 10 बजे पिकनिक के लिए निकलना है, लेकिन उसके पहले हमें सुबह का नाश्ता चाहिए। दो कप चाय तो संडे को हो ही जाती है। घर से निकलने के पहले पूजा तो होनी ही चाहिए। और गन्दा घर छोड़ के कौन जाता है।

आज जब वापस देखता हूँ, अपने बीते हुए स्पेशल संडे की लिस्ट को, तो उनमे से लगभग सारे ही संडे को स्पेशल बनाने में मम्मी का योगदान बहुमत में दिखता है। चाहे कहीं पिकनिक का प्लान हो, तो मम्मी सुबह से ही लग जाती थी, छोले, पनीर, पूरियां और पुलाव बनाने में। या फिर घर में आलस में बिताया हुआ संडे, जहाँ बैठे-बैठे लजीज़ नाश्ता, खाना, खीर, स्नैक्स इतियादी मिल जाता था। उस बैठे-बैठे डिलीवरी के पीछे कोई अपना संडे बड़ी मुशक़्क़त से गुज़ार रहा होता था।

ऐसा नहीं है की इन कामों में हम हाथ नहीं बटाते, लेकिन संडे का दिन है, एक ही दिन तो मिलता है relax करने को।

आज हम रिलैक्स कर रहे हैं।

और मम्मी का क्या है? वो तो कभी भी रिलैक्स कर सकती है।

मम्मी का तो सातों दिन संडे होता है!

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