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Sunday Wala Blog #12: Roz Roz ka Power Cut

कल रात अचानक कुछ ऐसा हुआ को आमुमन बड़े शहरों में होता नहीं है। बिजली चली गई। तुरंत ही ऑफिस से आया था, मन था ac चला कर आराम से मैच देखूंगा। इधर मैंने remote का बटन दबाया और उधर पूरी सोसायटी में अंधेरा छा गया।

तुरंत ही बोरियत का डर मुझे सताने लगा। जी हां, बोरियत खुद नहीं महज़ उस का ख्याल। खुद के साथ खाली बैठने का डर। वहीं डर जो 90 सेकंड के सिग्नल पर भी हमें मोबाइल चेक करने पर मजबूर कर देता है। वैसे तो अक्सर हमारे पास इस डर का डिफॉल्ट इलाज होता है हमारा मोबाइल फोन, और मैं भी अंधेरे में, बोरियत से बचते हुए, तुरंत ही मोबाइल की ओर लपका।

मगर आज सुबह उठ के सबसे पहले न्यूजपेपर देखा था शायद। इतना बुरा दिन, किसी नेता के चेहरा देखने पर ही गुजर सकता था। मोबाइल पर बैटरी देखी तो 12%! आज दिन भर की मीटिंग और बॉस के ओपन एजेंडा के सेशन के चलते फोन चार्ज करने का वक़्त ही नहीं मिला। सोचा था घर में चार्ज कर लेंगे, करना ही क्या है! लेकिन यहां तो दूसरा ही इंतजाम पनप रहा था।

अब ये 12% मेरी ज़िन्दगी के सबसे महत्वूर्ण 12% होने वाले थे। ये 12% ना मुझसे कोई गेम छीन सकता था, ना ही फ़्लैश लाइट। ये 12% सिर्फ मेरी मां को ये बताने में जाएगा, की बिजली क्यूं गई है, कब आएगी, खाना कैसे बनेगा, मैं क्या करूंगा जब तक बिजली नहीं आएगी, और आ गई तो फोन करूं।

अब ना ac था, ना मैच था, और ना ही मोबाइल था। गर्मी भी अचानक से अपने पांव फैलाने लगी थी। मैंने तय किया कि ये अच्छा मौका है, आज देख ही लेते हैं की अपनी सोसाइटी के जिन amenities के मैं इतने पैसे देता हूं, वो आखिर हैं क्या?!

नीचे पहुंचा तो सोसाइटी में तो मेला लगा था। बच्चों की मौज थी। पढ़ाई की छुट्टी और खेल के समय में अभूतपूर्व इज़ाफ़ा। उनके लिए तो ये पॉवर कट वरदान था – ठीक वैसे ही, जैसे मेरे लिए हुआ करता था।

मेरे मोहल्ले में बिजली जाने का वक़्त था साढ़े सात से साढ़े आठ। बिजली जाने का वक़्त! और हम भी अपना शेड्यूल उसके आगे पीछे बना लिया करते थे। मम्मी खाना बना चुकी होती थी, हम होमवर्क कर चुके होते थे और पापा … पापा कुछ नहीं कर पाते थे। न्यूज़ उन दिनों सिर्फ दूरदर्शन पर आता था, वो भी आधे घंटे, साढ़े आठ से नौ। तो पापा लाइट वापस आने का इंतज़ार करते थे बस।

एक कोने में कुछ बच्चे भाग दौड़ मचा रहे थे। एक तरफ नानी या दादी कहानी सुना रही थी। एक तरफ अंताक्षरी चल रही थी। मैं रोज़ लगभग इस वक़्त अपनी सोसायटी में टहला करता था, लेकिन आजतक ऐसा खुशनुमा माहौल नहीं देखा।

जिन लोगों की परवरिश बिना पॉवर कट के हुई है, उन्हें ये समझाना बहुत मुश्किल है कि बिना बिजली के, अंधेरे में, बिना टीवी, बिना पंखे के बिताया हुआ वो जो एक घंटा था, वो हमारे पूरे दिन का सबसे शानदार एक घंटा होता था।

उसी एक घंटे में मैंने अपनी मम्मी के बचपन के बारे में जाना है, अपने पापा से प्रेमचंद कि कहानियों पर बातें की हैं, भाइयों के साथ बोर्नविटा क्विज कॉन्टेस्ट खेला है और आधे मोहल्ले के साथ अंताक्षरी खेली है।

वो दौर ही था जब बिजली वापस आने का दुख हो जाता था।

मैं आज और कल को एक साथ जीने ही लगा था, की अचानक बिजली आ गई। सब मम्मियां बच्चों के पीछे लग गई – खेल बंद कराने को। सभी पपाओं का मोबाइल चार्ज करना रह रहा था। सभी खेल बंद हो गए, अंताक्षरी बीच में ही रह गई, कहानियां to be continued हो कर लिफ्ट में चली गई।

आज भी बिजली वापस आने का दुख हो रहा था।

चारों तरफ की रोशनी ने पिछले घंटे भर में फैला सुकून मिनटों में खत्म कर दिया। लोग फिर से अपने चार्जरों से जुड़ गए।

मुझे तो लगता है, हम हर रोज़ एक घंटे का पॉवर कट डिजर्व करते हैं।

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