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Sunday wala blog #13: Sunday subah ka nashta

एक परफेक्ट सन्डे बहुत सारी चीज़ों से मिल कर बनता है। टीवी, मूवी, और किस्सों के अलावा जो एक चीज हर सन्डे को खास बनाती है, वो है सन्डे का नाश्ता।

बचपन की बात याद है, उस समय हमारे देश में वीकेंड जैसा कुछ नहीं होता था, सिर्फ सन्डे होता था। जिसका मतलब ये था कि मम्मी की खाना खज़ाना, सरिता, गृहशोभा में पढ़ी सारी रेसिपी सन्डे के दिन आजमाई जानी थी। इतना ही नहीं, हमारे हफ्ते भर की ज़िद्द, पापा के कंफर्ट फूड की क्रेविंग को भी सन्डे को ही मौका था सांस लेने का। और कुछ थे ये क्रेविंग, ज़िद्द और रेसिपी से ऊपर, वो थे कभी स्वादानुसार या बेस्वादनुसर छिड़के हुए रिश्तेदार। रिश्तेदार एक तरह से मैच में हुए बारिश कि तरह थे, सारे प्लान पर पानी फेर देने वाले।

हमारे यहां सुबह का नाश्ता काफी जुदा था। एक ऐसी डेलिकेसी जिसकी महानता का अंदाज़ा उसकी सिंप्लिसिटी के बिल्कुल विपरीत है। हमारा सुबह का नाश्ता था – माड़ भात और नींबू का अचार। छेत्रिय शब्दावली से अपरिचित लोगों को समझा दूं, की माड़ यानी चावल पकाने के समय बचा हुआ पानी और स्टार्च। भात यानी पका हुआ चावल। और नींबू का अचार आप खा कर ही समझ सकते हैं, माफ कीजिएगा।

बात ऐसी है कि हम रहते थे ज्वाइंट फैमिली में, और जब सुबह सुबह १२ बच्चे – मम्मी भूक लगी कि ज़िद्द करे, तो सहूलियत ममता पर भारी पड़ जाता है।

वैसे बात माड़ भात की नहीं, कुछ लोगों के लिए ये आलू पराठा हुआ करता था, कुछ के लिए पूरी सब्जी, और कुछ के लिए इडली – डोसा।

घर के हॉल से होते हुए, हॉस्टल की मेस, और कॉलेज की कैंटीन को पार करते हुए, आजकल हमारे सन्डे का नाश्ता ब्रंच बन गया है।

वैसे ब्रंच भी कोई बहुत अलग चीज नहीं है। आलस, सहूलियत, और सन्डे का एक खूबसूरत मिश्रण है। नाश्ते से लेट उठते हैं और लंच का इंतज़ार लंबा हो, तब ये ब्रंच आपके काम की चीज है। मैं तो बड़ी शौक से ब्रंच करता हूं। काश कि हमारे पपाओ को ब्रंच की आदत होती, तो मम्मी का भी सन्डे आराम से शुरू होता।

बात ये है कि काफी सन्डे ब्रंच में काफी देशों के काफी पकवान खाए हैं। लेकिन मुझे कभी उनमें से किसी पकवान में वो माड़ भात वाला स्वाद नहीं आया। मज़े की बात ये है कि मेरे एक दोस्त को कभी उस आलू पराठे का स्वाद नहीं मिला, एक को वो पूरी आलू का स्वाद नहीं मिला, और वो इडली का स्वाद वापस मिला।

अब तक तो हम ये समझ चुके हैं, की वो स्वाद ना तो माड़ भात का था, ना आलू पराठे का, ना आलू पूरी का, और ना ही इडली का। वो स्वाद था परिवार का, सबके साथ होने का, बचपन का, प्यार का।

भले वो सारे ingredients आज मेरे सन्डे के नाश्ते में ना मिले, लेकिन आज भी मैं चावल में पानी थोड़ा ज़्यादा पानी डाल लेता हूं और नींबू के अचार के साथ, एक कटोरा बचपन वाला सन्डे चख लेता हूं।

आप कैसे चखते हैं अपना बचपन वाला सन्डे?

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