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Sunday Wala Blog #15: Paani Chala Gaya

“पानी अभी तक नहीं आया?” पापा ने मेरी तरफ आशा भरी निगाहों से मेरी तरफ देखा।

आज सुबह से ही पानी गायब था। बिना खबर ऐसे पानी गायब हो जाना विपदा से कम ना था। पापा को अभी अभी पाकिस्तान का दर्द महसूस हो रहा था, जो मोदी जी के वॉटर ट्रीटी के तोड़ने के बाद आया होता।

वैसे हमारे पानी के नहीं आने के पीछे देश विरोधी ताकतों का हाथ नहीं था। कम से कम अभी तक अरनव गोस्वामी ने घोषणा तो नहीं कि थी।

मुझे तो बचपन का एड याद आ जाता था – रोहन, पानी चला जाएगा।

हमारी पूरी सोसाइटी में कल से ही सूखा पड़ा था। हमारे इलाके के पानी सप्लाई का पाइप फट गया था, जिसके कारण पानी सोसाइटी तक नहीं पहुंच रहा था।

जैसे तैसे टैंकरों की मदद से ज़रूरी कामों के लिए पानी मुहैया कराया जा रहा था। कल रात को जब पानी आया तो हमें लगा पानी आ गया आखिरकार।

मम्मी खाना बनाने में लग गई, पापा टीवी देखने में, और मैं आदतन अपने ऑफिस का काम करता रहा। पानी फिर से चला गया।

पानी का संकट गहरा सा गया अचानक। बर्तन धुले नहीं थे, कपड़े वाशिंग मशीन में पड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, और घर में गंदगी फैली थी। घर में कुल २ बाल्टी पानी था, जो कि मम्मी ने भर लिया था उतने देर में।

नल बंद होते ही मम्मी हॉल में आ कर खड़ी हो गई। उसकी आंखों से ताने और इल्जाम दोनों साथ साथ बरस रहे थे। थोड़ी देर बाद शब्दों ने भी बरसे।

ताना पापा को, इल्जाम मुझे।

“कब से कह रहे हैं, कपड़ा धो दो, लेकिन नहीं, घुस जाओ लैपटॉप में।”

“और आप? ये सेट मैक्स वाले रोज़ एक साउथ इंडियन पिक्चर ढूंढ़ लाते हैं, और आप वो देख जाते हैं। आस पास क्या चल रहा है, कोई मतलब ही नहीं।”

समझदार तो हम दोनों थे। चुपचाप अपने अपने हिस्से की दांट और ताने सुन के बैठ गए। और १० मिनट के कूल ऑफ पीरियड के बाद, फिर से अपने अपने स्क्रीन के गुलाम हो गए।

सन्डे की सुबह तो सूखी थी है। फिल्टर के पानी से चाय का बर्तन भी धुला और चाय भी बनी। इस पानी के संकट से निकलने के लिए जागना ज़रूरी था, और जागने के लिए चाय – तो इस बात पर तो किसी का कोई विरोध नहीं था। और चाय पी कर फिर सब बैठ गए, क्यूंकि सन्डे सुबह चाय मिल जाए तो लगता है कि ज़िन्दगी की सारी परेशानी थोड़ी देर के लिए तो खत्म हो गई। अजीब सा चक्कर है ये भी।

“कल की बाल्टी से दो मग पानी में हम नहा लेते हैं, पूजा करना है। उसके बाद ही कुछ होगा।” ये कहते हुए मम्मी ने दिन को आगे बढ़ाने की कोशिश की।

मैं और पापा अभी भी बैठे ही थे। पानी नहीं था, पर बिजली थी और हम दोनों के फोन भी चार्ज थे।

मम्मी अपने वादे अनुसार स्नान के बाद पूजा में लग चुकी थी। हम दोनों अपनी आदत अनुसार, अपने अपने स्क्रीन में लगे हुए थे। अचानक किचन के नल से पानी की एक तेज़ धार ने दस्तक दी।

मेरे मुंह से निकला – ‘ अरे! पानी आ गया. ‘

मम्मी ने पापा की तरफ देखा, मैंने मम्मी की तरफ, और हम तीनों ने एक दूसरे की तरफ।

मैं भाग कर वाशिंग मशीन की तरफ़ निकला और पापा किचन की तरफ। मैं कपड़े धोने लगा और पापा बर्तन। मम्मी अभी भी पूजा कर रही थी। शायद वही कारण था कि पानी अभी आया था, इसलिए हमारे अंदर उस प्रोसेस को डिस्टर्ब करने की हिम्मत नहीं आई।

मम्मी की पूजा का एक एक अध्याय खत्म हो रहा था, और यहां घर के एक एक काम। घर साफ हो चुका था, बर्तन चमचमा रहे थे, कपड़े झूल रहे थे। आखिरकार पूजा समाप्त हुई और मम्मी ने हम दोनों के हाथ में प्रसाद रखा।

प्रसाद खा कर मैं हाथ धोने पहुंचा और मेरे मुंह से निकला – ‘ अरे! पानी फिर से चला गया! ‘

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