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Sunday wala Blog #16: Sunday wala Cinema

मिडिल क्लास परिवारों में थिएटर में सिनेमा देखना एक वार्षिक उत्सव से कम नहीं। उंगलियों पर गिन सकता हूं वो फिल्में जो बचपन से आजतक थिएटर में सपरिवार देखे हैं।

आज भी जब किसी सन्डे फिल्म देखने का प्रोग्राम पिच करना होता है, तो पूरे रिसर्च के साथ proposal बनता है। पैसे भले आप दे रहे हों, प्रोजेक्ट का approval आज भी पापा ही करते हैं।

ये वाला सन्डे, इस साल का वो वाला सन्डे था। रिसर्च शुरू हुआ। फिल्में तो कई लगी थी। आजकल एक बार में कितने ही फिल्में बनती है और सारी मिला कर एक भी नहीं बन पाती।

ये तो गनीमत हो कुछ एक्टर्स का जो अभी स्टार्स नहीं बने हैं, वो कुछ ऐसी कहानियां सुना जाते हैं, जो पूरी भी होती हैं और हमारे आस पास की भी होती है। ऐसी ही एक फिल्म को देखना मुकर्रर हुआ।

“अरे टिकट बुक कर को ऑनलाइन। 12 से 3 या 3 से 6 वाले में से एक ले लो।” पापा ने ऑनलाइन शब्द का इस्तेमाल करते हुए आधुनिकता का परिचय तो दिया लेकिन शो टाइमिंग बता कर तुरंत है अपने साथ मुझे भी एक बीत चुके वक़्त में ले गए।

“बहुत सारा शो है। 11.30 का है, 12.30 का है, 1.30 का, 2.30 का, और हर घंटे का है।” मैंने अपने रिसर्च की विशिष्टता ज़ाहिर की।

“हैं! इतना शो! ऐसे कैसे है? एक ही घंटा का सिनेमा है क्या?”

मुझे समझ आया की पापा को मल्टीप्लेक्स का कॉन्सेप्ट यूं समानता से नहीं आ रहा था।

“अरे पापा, खूब सारा स्क्रीन होता है। एक ही नहीं। थिएटर नहीं, थिएटर का गुच्छा होता है मल्टीप्लेक्स।”

“अच्छा! और सब स्क्रीन 70 mm होता है?”

“पता नहीं। वो सिक्योरिटी वाला इंची टेप लेकर घुसने नहीं देता है।”

पापा समझ चुके थे कि मैं irritate हो रहा हूं, और मैं समझ गया था पापा instigate होने वाले हैं। ऐसी संभावनाओं में, बेटे और पिता को जितना पता होता है, उन दोनों से ज़्यादा पता होता है, मां को।

“छोड़ो ना भाई। शुरू से ही 3 से 6 का देखते हुए आए है, वही देखेंगे।” मम्मी ने बात संभालते हुए, और प्रोजेक्ट को सील करते हुए कहा।

“हां, वही सही रहेगा। दिन में खाना खा के चलेंगे, और रात का खाना भी घर पर खा लेंगे। बीच में भूख भी नहीं लगेगी।” पापा को सुझाव पसंद आने लगा था।

ये मिडिल क्लास परिवार की खूबसूरती होती है। वो सिंगल स्क्रीन थिएटर से निकल कर मल्टीप्लेक्स में तो आ गए हैं, लेकिन जितना महंगा उन्हें उस थिएटर का समोसा लगता था, उतना ही महंगा आज का नाचोस भी है।

उबर बुक हुआ, हम फिल्म देखने पहुंचे। भगवान का शुक्र था कि पैसे बर्बाद नहीं हुए और पिक्चर अच्छी निकली। इंटरवल में हम में से कोई नहीं उठा। मेरे पास पैसे तो थे, लेकिन ना मेरी हिम्मत थी ना ही हैसियत की मैं अपने पापा को 500 का पॉपकॉर्न ऑफर भी कर पाऊं।

सिनेमा खत्म हुआ और हम तीनो बाहर आ कर खड़े अपने कैब का इंतज़ार कर रहे थे। थोड़ी हिम्मत कर के मैंने कहा, ” बहुत सी और भी अच्छी फिल्म लगी हुई है, चाहे तो अगले सन्डे भी आ सकते हैं।”

“अरे छोड़ो अब अगली बार बॉम्बे आएंगे तो चलेंगे।”

“लेकिन अब तो आप अगले साल आएंगे।”

“हां तो अगले साल चलेंगे।”

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