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Sunday वाला blog #2: Sunday वाला मैच

वैसे तो संडे की सुबह थोड़े आराम से ही होती है, लेकिन आज की सुबह थोड़ी जल्दी हो गयी थी। बहुत दिनों के बाद आज वाला संडे आया था। बहुत दोनों बाद क्रिकेट वाला संडे आया था। बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी में इंडियन टीम ने कमाल क्या दिखाया, ऑफिस में एक नया जोश आ गया था क्रिकेट को ले कर। बहुत दिनों बाद, वही सब बातें सुनाई दे रही थी, जो सचिन – सेहवाग – गांगुली – द्रविड़ – लक्षमण – कुंबले के वक़्त सुनाई देती थी।

बातों बातों में किसी ने तो ये गूगली डाली की संडे क्रिकेट खेलते हैं, और जोश जोश में सब ने कैच भी कर लिया। तय हो गया, की ग्राउंड बुक कर लिया जाए, और सब 8:30 तक ग्राउंड में पहुँच जाए।

मैंने भी बीती रात अपनी ट्रैक पैन्ट्स ढूंढ के निकाल ली थी, अलमारी के north east corner में पड़ी थी, ignored. स्पोर्ट्स शूज से धुल भी साफ़ कर ली थी। आज शायद पहली बार ही उनका इस्तेमाल स्पोर्ट्स के लिए होने जा रहा था। खैर, तैयार हो कर मैं कार तक पहुंचा, काफी excited.

क्रिकेट हमें अपने बचपन में ले जाता है। शायद इसलिए हम कभी उस से नाता छुड़ा नहीं पाते। और जिस दिन छुड़ा लेते हैं, अचानक से बड़े हो जाते हैं। जिस दिन सचिन रिटायर हुआ था, मैं उस दिन अचानक से बड़ा हो गया था। वैसे सचिन मेरा फेवरेट क्रिकेटर भी नहीं है, मुझे तो उस से भले गांगुली, सेहवाग और द्रविड़ लगते हैं। लेकिन सचिन उस क्लास का मॉनिटर था, वो टाइम भले इन सब का रहा हो, लेकिन कहलाएगा वो सचिन वाला टाइम ही। हर डिस्कशन की शुरुआत उसी से होगी, जब तक की कोई बगल में बैठा हुआ ये नहीं बोले, की यार उस वक़्त तो सभी क्लास प्लेयर थे – गांगुली, सेहवाग और द्रविड़ क्या कम थे? और लक्षमण? अभी भी ऑस्ट्रलियन टीम को सपनो में आता होगा।

आज का ये मैच मुझे भी अपने बचपन में ले जा रहा था। मैंने कार का रेडियो on नहीं किया। मैं आज में तो था, लेकिन आज में वापस नहीं आना चाह रहा था।

पापा मेरे लिए SS का bat ले कर आये थे, जब मैंने क्लास टॉप किया था। काफी मेहेंगा बैट था। बैट की तीन category होती थी बचपन में, cosco बैट, corckett बैट और dues बैट। दूकान वाले ने पापा को dues बैट कह कर बेचा था वो बैट। वैसे तो उस बात की पुष्टि कभी नहीं हो पायी, की वो किस केटेगरी का बैट था। पर मुझे पूरा यकीन था, की पापा को बेवकूफ बना दिया गया है। मैंने पापा को समझा कर भेजा था, की MRF या britannia के अलावा कोई बैट नहीं लेने। लेकिन पापा तो पापा ठहरे। अच्छा लेने के चक्कर में SS ले आये!

वो तो बहुत सालों बाद पता चला, की MRF, Britannia, Reebok सब स्टीकर है, असली बैट तो SS ही है। ठीक जैसे अपने पापा के बारे में पता चल जाता है, की फिल्मों, कहानियों, टीवी पर दिखने वाले सारे हीरो तो स्टीकर हैं, असली वाले तो हमारे पापा हैं।

ओपनर बैट्समैन था मैं अपने मोहल्ले का। आज भी कई innings याद हैं मुझे अपनी। मुझे तो ये भी भरोसा है की एक-आधी तो बॉलर्स को भी याद होंगी मेरी innings. खैर, टीम का चुनाव हो रहा था। आगे बढ़ के कुछ लोग कप्तान बन गए और टॉस कर लिया। इस पूरी प्रक्रिया में, मैंने कुछ नहीं कहा। हाँ, लेकिन जब मेरा कप्तान टॉस जीत गया, तो मैंने कहा की ओपनिंग तो मैं ही जाऊँगा। हार जीत सब अपनी जगह, मैं तो अपना संडे दोहराने आया था।

मैच तो आगे बढ़ा। थोड़ा थोड़ा मैं भी बढ़ा। मन ही मन में मैं फिर से सेहवाग हो गया था, और सेल्स का दिनेश, शोहैब अख्तर। पहली ही गेंद पर, मेरे सारे विकेट बिखरे मिले। सेहवाग वाली फुर्ती बस मन में ही सीमित हो चुकी थी। hand – eye coordination तो अब भी बुरा नहीं था मेरा, बस बीच में इस तोंद का हिसाब करना भूल गया था।याद तो मुझे ये भी इन्निंग्स रहने वाली थी, काफी दिनों तक।

मैच शुरू हुआ था, मैं आउट भी हुआ, नाम के लिए फील्डिंग की और हार भी गया। अब यार, उम्र कुछ भी हो, हारना कभी पसंद नहीं आता। लेकिन आज क्रिकेट खेलना अपने आप में एक जीत लग रही थी। तो इस हार का दर्द थोड़ा कम हुआ।

हम क्यों अचानक खेलना बंद कर देते हैं? क्यों हमारे संडे बदलने लगते हैं? जब हमें पता है, की खेलने वाले संडे अच्छे होते हैं, तो क्यों अचानक ही किसी संडे का मैच, हमारा आखिरी मैच हो जाता है?

इन्ही सब सवालों के साथ मैं घर वापस लौट रहा था। सब ने एक दूसरे से वादा लिया था, की हर संडे मिलेंगे और क्रिकेट खेलेंगे।

ये वादा भी उसी वादे की तरह था, जो किसी संडे टूट गया था।

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