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Sunday वाला Blog #3: Sunday वाला TV

कुछ Sundays जरुरत से ज़्यादा ही आलसी होते हैं। कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती।

ना आज क्रिकेट खेलेंगे, ना ही बाजार से समोसे जलेबी आएगी। आज तो चाय भी बमुश्किल बनेगी।

नहाने पर एक लम्बा अंतर्द्वंद चलेगा, pros एंड cons में विवाद होगा, और ज्यादातर ये फैसला बाद में लेने पर टाल दिया जाएगा। वैसे उसका फैसला तो हम सबको पता है, लेकिन 30 साल के उम्र के करीब, हम अपने आप को ज़रा strictly judge करने लगते हैं। और सुबह सुबह मैं अपनी अधजगी आँखों में नहीं गिरना चाहता था।

घड़ी मुझे ऐसे घूर रही थी, जैसे वो कितना काम कर चुकी हो सुबह से, और मैं बेशर्मो की तरह पड़ा हुआ हूँ। थोड़ी तो शर्म थी मुझमे, मैं खुद को खींचता हुआ हॉल तक आया। हॉल का सोफे का एक ही काम होता है – टीवी की तरफ मुँह कर के इंतज़ार करना, की मैं आऊं और इन दोनों का मेल कराऊँ।

TV ऑन किया गया।

वैसे तो कोई ख़ास उम्मीद नहीं थी, लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है की 376 channels में से एक भी देखने लायक न हो!

हम एक से 376 channels तक कब पहुँच गए?

उस एक चैनल पर पूरे दिन देखने लायक प्रोग्राम आते थे, आज इन 376 पर एक भी नहीं आता!

वैसे तो laptop on करता तो उसमे Netflix, Prime, Hotstar और न जाने कितने ही apps का प्रीमियम प्लान ले कर बैठा था मैं, परेशानी बस ये थी, की उनमे से कुछ चुन के लगाना पड़ता। किसी में भी ऐसा कुछ नहीं था, जहाँ आलस mode हो, जो कह दे की यार आज कुछ ऐसा चला दो, की वो बैलेंस बना रहे की कुछ देख भी न रहे हों, और कुछ चल भी रहा हो – जैसे की मेरी मम्मी रंगोली देखा करती थी, किचेन की खिड़की से, बस कुछ वैसा ही।

मुझे याद है, एक बार मैं पापा के साथ किसी रिश्तेदार के घर गया था। वो लोग पापा को ज़्यादा पसंद नहीं थे, इसलिए काम निपटा कर 10 मिनट में निकल लेना था। लेकिन उन्होंने ज़िद्द कर ली, की एक तो इतने दिनों पर पधारे हैं, ऊपर से चाय भी न पी कर जाएँ, ऐसा तो हो ही नहीं सकता।

अब चाय अकेले तो आएगी नहीं, शर्मीली होती है, साथ में पकोड़े, नमकीन, बिस्कुट भी आएँगे।पकोड़े तलने के लिए तेल को गर्म भी होना पड़ेगा। और इस पूरे इंतेज़ाम में तो एक चीज़ लगेगी, वो है टाइम। वैसे तो क़ायदे से, संडे को टाइम ही तो भरपूर मात्रा में होता है, लेकिन बात यूँ थी की 8:45 हो चुके थे और 15 मिनट में बी आर चोपड़ा की पेशकश, महाभारत।

महाभारत, भारत पाकिस्तान के मैच के अलावा वो इकलौती चीज़ जो पूरे हिंदुस्तान को बाँध कर रख सकता था । और साथ में मेरे पापा को भी।

आज जब एक परिवार के 5 लोग भी एक साथ बैठ कर एक प्रोग्राम नहीं देख पाते, उन दिनों पूरा परिवार, पूरा मोहल्ला, पूरा देश एक ही प्रोग्राम देखता था। मतलब बस इतना समझ लीजिये की जिन अंकल के यहाँ बैठना मेरे पापा को 15 मिनट के लिए भी नागवार था, वहीँ पर हमने अगले 1 घंटे तक महाभारत देखी।

पता नहीं, उस प्रोग्राम में कुछ अलग बात थी, उस वक़्त में या फिर उस संडे में – जो भी था, कुछ तो अलग था।

अच्छा संडे होता था, जब इतने options नहीं थे। जब हम महाभारत पापा की पसंद से देखते थे, रंगोली मम्मी की पसंद से और शाम 4 बजे वाली film हमारी ज़िद्द से।

आज का भी संडे बुरा नहीं है। ऐसा करते हैं, की संडे को अपने अपने screens नीचे रख देते हैं, और एक दुसरे की ज़िद्द से, पसंद से, थोड़ा एडजस्ट कर के, एक स्क्रीन पर, एक साथ कुछ देखते हैं।

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