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Sunday वाला blog #4 : Sunday वाले फूफा/ मामा/ मौसा

“और, बड़े हो कर क्या बनोगे?”
“आई एस”

सुबह सुबह पापा का फ़ोन बजा तो पता चला इस संडे का appointment फूफा/ मामा/ मौसा के नाम है। ( फूफा/ मामा/ मौसा यूँ लिखा गया है की अगर इनमे से किसी के हाथ ये blog पड़ भी जाए, तो मेरे घर में महाभारत का मिनी-एपिसोड ना चल जाए)।

संडे और फूफा/ मामा/ मौसा का कॉम्बिनेशन मुझे वैसे तो बहुत कुछ याद दिलाता है, लेकिन ये सवाल सबसे पुरानी जुडी यादों में से एक है। जो भी रिश्तेदार आते, उनके सवाल का set fixed होता, बस order ऊपर नीचे हो जाता था।

मुझे लगता है, हमारे फूफा, मामा, मौसा लोगों को बच्चों से small talk करने की कला का ज़रा भी ज्ञान नहीं था। सच बताऊँ तो हमारे पिछले generation को small talk आज भी नहीं आता। 12 साल से मम्मी और पापा रोज़ रात को फ़ोन करने पर एक ही सवाल कर रहे हैं – खाना खा लिया? जब मम्मी पापा अपने बच्चों से small talk नहीं कर पा रहे, तो ये रिश्तेदारों की क्या बिसात।

खैर रिश्तेदार कोई भी हो, और question set कोई भी फंसे, लेकिन बचपन का ये सवाल लगभग default हुआ करता था।
उसी तरह default होता था मेरा रटा हुआ जवाब भी – आई एस।

मेरे साथ शायद लाखों बिहारी बच्चों का भी default जवाब – आई ए एस ।

वैसे आपने ध्यान दिया हो, तो मैं कई सालों तक आई एस ही बोलता था। चूँकि बोलता था, इसलिए कोई गलती पकड़ नहीं पाता था।
वो तो बहुत दिनों बाद पता चला, की I S जैसी कोई चीज़ ही नहीं होती, होता तो IAS है।

मेरे आईएएस बनने के ख्वाब के पीछे अपने ही रीज़न थे। सबके अपने अपने होते हैं। मैं तो इसलिए बनना चाहता था, क्यूंकि मेरे पापा ने बोला था। मेरे पापा मुझे इसलिए IAS बनाना चाहते थे, क्यूंकि उनके boss IAS थे, और उनका रौब असीमित था।

हर बच्चे का बचपन एक असीमित पोटेंशियल रखता है अपने पास। हर बच्चे को लगता है, की वो कुछ भी बन सकता है। उनके माँ बाप को भी लगता है की उनका बच्चा कुछ भी बन सकता है। मेरे ही पापा को लगता था मैं आईएएस बनूँगा, बताईये।

आधे हिंदुस्तान को क्रिकेटर इसलिए बनना था, क्यूंकि सचिन तेंदलकर ने 18 साल की उम्र में धूम मचा रखी थी। फिल्म स्टार बनने के तो कितने ही reason गिनाऊँ, कम ही पड़ेंगे। उस वक़्त तक ये इंजीनियर बनाने वाली फैक्टरियों का चलन शुरू नहीं हुआ था।

हाँ कुछ लड़कों को space में जाना था, नील आर्मस्टांग, यूरी गागरिन, और राकेश शर्मा की तरह। ये वो वाले लड़के थे, जिनको exposure थोड़ा ज्यादा था। जिनके घर कंप्यूटर था, और ब्रिटानिका इनसाइक्लोपीडिया की सीडी।

थोड़ी लड़कियां, जिनको नयी नयी आज़ादी मिली थी ख्वाब देखने की, वो डॉक्टर बनना चाहती थी। लेकिन, वो पढ़ाकू बोरिंग टाइप की लड़कियां थी। अच्छी लड़कियां थी।

जो तेज़ लड़कियां थी, जिनके बारे में स्कूल बसों की पिछली सीट पर चर्चाएं हुआ करती थी, उनको या तो मिस इंडिया बनना था, या एयर होस्टेस, या फिर दोनों। एक्ट्रेस नहीं बनना, अच्छे घर की लड़कियां फिल्मों में काम नहीं करती थी तब तक।

वो संडे बीता और कई संडे बीते, कुछ सच्चाइयों से सामना हुआ।

एक भइया का IIT में एडमिशन हो गया। सरकारी नौकरी की प्रतिमा के बराबर की ये तीसरी चीज़ थी जो मार्केट में आयी थी। इसके पहले बैंक और टाटा स्टील की नौकरियां ही सरकारी नौकरी की तुलना में आती थी।

उन भइया की सफलता के बाद, 3 और भइया लोग IIT जाने में जुट गए, या जुटा दिए गए। वो 3 IIT तो नहीं पहुँच पाए, लेकिन बैंगलोर गए इंजीनियरिंग करने। बैंगलोर के इंजीनियरिंग कॉलेज IIT के बाद दुसरे नंबर पर आते थे, ऐसा हमें उन तीनो अंकल ने बताया जो उन तीनो भैया के पापा भी थे।

कुछ दीदियां जो डॉक्टर बनना चाहती थी, उन्होंने bio लेने से परहेज कर लिया, क्यूंकि उसमे मेंढक और कॉकरोच की चीड़ फाड़ करनी पड़ती थी, जो की उनको काफी बाद में पता चला। ख़ुशी की बात है, की जो दीदी वाकई बनना चाहती थी, वो आज आज़ाद भी है और डॉक्टर भी।

जो एयर होस्टेस और मिस इंडिया बनना चाहती थी, उनके शादी के प्रपोजल वक़्त से पहले आ गए। कुछ ने वो प्रपोजल एक्सेप्ट कर लिए और कुछ ने किसी न किसी डिग्री का बहाना बना कर शहर बदल लिया। आज भी वो keto, atkins और zumba की area specialists हैं।

उसके बाद की लहर में हम सारे चपेट में आ गए। और इसके पहले की कुछ और बन पाते, इंजीनियर बन गए। जो इंजीनियर बनने से बच पाए, वो डॉक्टर बन गए। इन दोनों से जो बच पाएं, वो हमारे जनरेशन के hippies हैं, arts, law और etc वाले।

अच्छी बात ये रही, की ज़िन्दगी के सवाल के बदले बिना, हमारे जवाब बदलते गए। आज कहीं न कहीं पहुँच गए हैं। ज़्यादातर वहां नहीं हैं, जहाँ के लिए चले थे, पर जहाँ हैं वहां से बहुत ज़्यादा शिकायत नहीं है।

घंटी बजी। सामने फूफा/ मामा/ मौसा खड़े थे। स्वागत हुआ, चाय चढ़ाई गयी थी, बिस्कुट और नमकीन का मिलन हुआ।

मैं भी बैठकी में शामिल हुआ। जो बातें शुरुआत में होती थी, वो हो चुकी थी। अगर घर में कोई बच्चा होता, तो उस से अब पूछ लिया जाता – “और, बड़े हो कर क्या बनोगे?”

उसी मौके पर, फूफा/ मामा/ मौसा मेरी तरफ घूमे और पूछा – “और शादी का क्या सोचा है?”

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