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Sunday वाला blog #5 : Sunday वाला connection

सुबह हुई। संडे की सुबह थी, तो थोड़े आराम से हुई।

अधखुली आँखों और अधजगे हाथों से मैंने अपना मोबाइल उठाया। उठाते ही मैंने WiFi on किया।

सुबह उठते ही मोबाइल उठाना, WiFi कनेक्ट करना, और दुनिया भर की बकवास consume करना हमारे सुबह का एक अभिन्न अंग बन गया है। कहीं न कहीं तो हमें अच्छा भी फील होता है की अच्छा हुआ की हम सो गए – मोबाइल भी चार्ज हो गया और थोड़े notifications भी जमा हो गए, देखने – पढ़ने के लिए।

और सुबह जैसे ही मोबाइल को WiFi से कनेक्ट कीजिये, ऐसा लगता है जैसे मोबाइल के चार्जिंग पोर्ट के जरिये Red Bull में शिलाजीत घोल कर दाल दिया हो। टुन, टुन, टुन, टिंग, ट्रिंग, पिंग, टुन।

मोबाइल थोड़ी देर टुन – टुनाने के बाद शांत हो गया। कुल 14 गुड मॉर्निंग फॉरवर्ड्स थे, जिस में 4 तो एक ही फोटो थी, आयी 4 अलग लोगों की तरफ से थी। 5-6 अफवाएं थी, जो अपना अपना एजेंडा सपोर्ट करने के लिए लोगों ने फैला राखी थी। कुछ चुटकुले थे, कुछ नए, कुछ पढ़े हुए। कुछ पोलिटिकल विश्लेषण थे, कुछ इकनोमिक। झूठ, सच, अफवा, चुटकुले, विश्लेषण – इनफार्मेशन का एक बेहतरीन और चटकारे वाला चाट का प्लेट, पेश था bed tea के भी पहले।

आज कोई भी पर्सनल मैसेज नहीं था। वैसे, जितने लोगों के बारे में हम जानना चाहते हैं, जानते ही हैं। स्कूल वाले दोस्त की इंगेजमेंट हो गयी, फेसबुक पर फोटो देखी थी। पहली नौकरी वाला बेस्ट फ्रेंड सीनियर मैनेजर हो गया है, linkedin पर अपडेट आया था। पटना में ठण्ड बहुत पड़ रही है, भइआ ने धुंध वाली फोटो instagram पर डाली थी।

पहले इन बातों के लिए फ़ोन करना पड़ता था। अब बढ़िया है, बिना बात किये, सब पता चल जाता है। कनेक्शन के इतने तरीके हो गए हैं, लेकिन अच्छा है, इतनी बातें कहाँ हैं, जो इन तरीकों का इस्तेमाल करें।

मुझे याद है, मेरी माँ मंगाती थी अंतर्देशीय चिट्ठी, मौसी को भेजने के लिए। महीने में एक चिट्ठी, उसी में सबका हाल, खबरें, अपने दुःख, अपने सुख। उस चिट्ठी का जवाब भी आता था – महीने में एक बार। जवाब में भी वही – सबका हाल, खबरें, दुःख और सुख।

जब पड़ोस वाले अंकल के यहाँ टेलीफोन आ गया, तो महीने की चिट्ठी के साथ साथ, बीच में एक छोटा सा कॉल भी आ जाता था, हाल चाल के लिए। उस STD कॉल का अपना एक महत्व था। जो बातें फ़ोन पर होती, वो तो होती ही, बातें उसके बाद भी होती। कॉल खत्म होने के साथ आंटी चाय ले आती और फिर मोहल्ले की बातों का एक संछिप्त विश्लेषण होता।

ना STD कॉल वाले चाचा उन दिनों फेसबुक पर थे, ना चिट्ठी वाली मौसी मोबाइल पर, और ना ही मोहल्ले की aunties का whatsapp ग्रुप बना था।

अब तो हर घर में फ़ोन है। हर घर में 5 फ़ोन है। सभी फेसबुक, instagram, whatsapp पर हैं।

‘Going Solo’ mobile apps का अपना मार्केटिंग campaign हो चूका है। जितना ज्यादा कनेक्टेड हो गए हैं, उतना ही ज्यादा डिस्कनेक्टेड रहने का मन करता है।

ना STD कॉल वाले चाचा उन दिनों फेसबुक पर थे, ना चिट्ठी वाली मौसी मोबाइल पर, और ना ही मोहल्ले की aunties का whatsapp ग्रुप बना था।

Connected और disconnected के बीच का अंतर धुंधला होता जा रहा है। एक chat ग्रुप है जो ननिहाल वाले cousins का है, एक ददिहाल वाले cousins का, एक स्कूल वाले दोस्तों का है, एक ग्रेजुएशन वाले दोस्तों का, एक नौकरी वालों का है, एक मोहल्ले वालों का। सबसे जुड़े हुए ही हैं, सबको पता है की मेरा sense of humour कैसा है, सबको पता है की मैं किस कंपनी में हूँ, क्या नौकरी कर रहा हूँ, शादी हुई है की नहीं, किस पार्टी के लिए वोट करता हूँ।

बात बची मेरे हाल चाल, सुख दुःख की, तो एक फ़ोन कॉल की बात है, किसी भी संडे कर सकते हैं। किसी संडे कर ही लेंगे।

हाँ, जब तक वो संडे नहीं आता, तब तक के लिए रोज़ सुबह मैसेज भेज देते हैं – कुछ झूठ, सच, अफवा, चुटकुले, विश्लेषण।

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