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Sunday वाला blog #6: बचपन वाले त्यौहार

बचपन के सबसे खूबसूरत यादों में से एक बड़ा हिस्सा जुड़ा होता है त्योहारों से। बचपन की उम्र तक आप रिश्तेदारों की तरफ भागते हैं, उनसे दूर नहीं। अपने चचेरे, ममेरे, फुफेरे, मौसेरे भाई बहनो को भाई-बहन ही मानते हैं, cousins नहीं। और त्यौहार इन सब को एक साथ लाते थे, बचपन, रिश्तेदार, भाई और बहन।

वैसे तो हर त्यौहार ही बचपन में ज़्यादा रंगीन होता था, लेकिन कुछ त्यौहार ऐसे थे, जो बचपन के साथ ही ख़त्म हो गए। उनमे से एक था सरस्वती पूजा का त्यौहार।

आज सुबह मम्मी का फ़ोन आया – “टाइम पर नहा लेना और भगवन को अगरबत्ती दिखा देना। आज सरस्वती पूजा है।”

सुन कर थोड़ी सी मुस्कान आ गयी चेहरे पर मेरी। कितना पसंद हुआ करता था मुझे ये त्यौहार।

हर त्यौहार में तो पूजा होती थी, या हम घूमने जाते थे, या लोग हमारे घर आते थे। एक ये इकलौता था, जिसमे सबसे ज्यादा responsibilities और participation बच्चों की होती थी। कितनी पसंद थी हमें साल में एक दिन मिली responsibility!

सरस्वती जी की छोटी सी मूर्ति लाना, उनके लिए छोटा सा पंडाल बनाना, उम्र के हिसाब से; केले का पत्ता लाने से ले कर प्रसाद काटने तक के काम का deligation करना।

पूरे दिन भर का कार्यक्रम होता था। डांस वाले गानो की लिस्ट तैयार करना, गली के मोड़ वाले कैसेट दूकान पर blank कैसेट में वो सारे गाने रेडी करना। और उसके बाद दिन भर फॉरवर्ड – रिवाइंड कर के एक ही गाने पर नाचना। उफ़!

अब तो त्योहारों का मतलब बस छुट्टियों से रह गया है। जो त्यौहार पहले पंचांग देख कर मानते थे, अब ऑफिस की list of holidays देख कर मनाते हैं।। जिन त्योहारों की छुट्टियां हों, वही मनाई जाती हैं, और वो भी सब नहीं, उनमे से भी प्रायोरिटी लिस्ट बनती है। हर त्यौहार मानाने का पेशेंस भी तो नहीं रह गया है! जाने कब सरस्वती पूजा उस priority लिस्ट में इतना नीचे आ गया, की अगरबत्ती जलने की औपचारिकता के लिए भी मम्मी को याद दिलाना पड़ गया।

क्या बचपन में जब हम सरस्वती पूजा मना रहे थे, तो क्या वो त्यौहार हमारे माँ – पापा के लिए भी उतना ही बे-मतलब हो चूका था, जितना की हमारे लिए है? या फिर हम बहुत अलग बड़े हो गए हैं! ये सोचते सोचते मैंने उठ कर geyser on कर दिया।

नहाने के लिए कपडे ढूंढने लगा। अचानक कुछ याद आया, तो अलमारी के पिछले हिस्से में एक पुराणी टी-शर्ट राखी थी, सुर्ख पीले रंग की। वो टी-शर्ट निकली, और स्पीकर पर गाना चलाया – आ पप्पियाँ झप्पियाँ पा ले हम।
नहाने से पहले थोड़ा नाच भी लिया।

भले कहीं भी हों, कितना भी कम समय हो, कितने भी बदल गए हों, थोड़ा सा त्यौहार मना लेना चाहिए, थोड़ा सा बचपन जी लेना चाहिए।

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