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Sunday Wala Blog #8: Sunday wali Hajamat

“ये संडे भी बहाना बनाओगे की जाओगे बाल कटवाने?” मम्मी ने साफ़ साफ़ पूछ लिया।

मेरी माँ की ज़िन्दगी की currently दो ही priorities हैं – मेरी शादी और मेरी हजामत। पापा का मानना है की दोनों में बहुत ख़ास फर्क नहीं होता। आपको चुप चाप एक जगह पर बैठे रहना होता है, और जो दूसरा व्यक्ति बोले, वो करते रहना होता है।

पिछले संडे मैंने बहाना बना दिया था, की भीड़ बहुत है, नंबर लगाना पड़ेगा। उसके अगले संडे इंडिया का मैच था आ गया। मेरी हजामत 2 हफ्ते लेट हो चुकी थी। लेकिन आज, आज मुझे सलून जाना ही पड़ेगा। मम्मी को तो फिर किसी बहाने से मना लूंगा, लेकिन ऑफिस के लोगों की निगाहें अब सवाल करने लगी थी, उन सवालों पर रोक लगाना ज़रूरी हो गया था।

बचपन में सलून जाना किसी सजा से काम नहीं था। 20 मिनट तक शांत, एक जगह पर स्थिर बैठे रहो। कैसे कर लेते थे लोग ये, मुझे समझ में ही नहीं आता था। एक ही जगह पर स्थिर बैठे हुए, लोग आजकल अपनी ज़िन्दगी बिता लेते हैं – सच कहूं तो मुझे आज ये भी नहीं समझ आता।

ये जो नफरत थी न हजामत से, शायद इसी दौरान कभी मैंने भगवन से सच्चे दिल से मांग लिया होगा। इसलिए आज मेरे बाल, सब्ज़ी के फ़ोरन और लोक सभा के quoram जितने ही बचे हैं।। कम बालों का एक फायदा ये था की इनको कटवाने की threshold तक आते आते टाइम लगता है। और नुक्सान ये है की जैसे ही वो threshold पार होता है, ऐसा लगता है जैसे स्कूल की छुट्टी से बच्चे निकले हो – तेजी से चारों ओर फैलते हुए।

मेरे मोहल्ले वाले दोनों ठाकुर… हमारे तरफ नाइ को ठाकुर ही कहते हैं। क्यों कहते हैं, मैं ये जानने वाले generation के बाद पैदा हुआ था मैं, और ये पूछने वाले generation के पहले। बस, ठाकुर जी, तो ठाकुर जी।

हाँ, तो मेरे मोहल्ले में दो ठाकुर होते थे। जो मेरे घर के पास वाले थे, वो बड़े ही शांत, काम से काम रखने वाले, अच्छे बाल काटने वाले थे। और जो एक गली छोड़ कर थे, वो मोहल्ले के Chief Information Officer। उनके पास हर भाभी के देवर, हर ननद के तेवर और है सास के ज़ेवर की खबर थी। किस साहब के बेटे ने IIT निकला है, किसके लौंडे ने नहीं निकाला और क्यों नहीं निकला – सबकी खबर रहती थी। वाजिब से बात है, की हजामत की लाइन किसके यहाँ ज़्यादा रहती थी। खबरें देना इनका प्राइमरी बिज़नेस था, बाल काटना तो value added service में काउंट होती थी।

ये फेसबुक, whatsapp और यहाँ तक की Orkut के ज़माने से भी पहले के सोशल मीडिया हैं। सच कहूं तो आज भी, whatsapp से तेज़ अफवाएं फैलाने का माद्दा रखते हैं। मुझे याद है, दारोगा जी के लड़के और वकील साहब की लड़की के छज्जे वाले प्यार की पहली भनक मुझे इन्ही से मिली थी। सोचिये, दरोगा और वकील, लोमड़ी के निकट के सबसे तीव्र शक्ति के सूंघने वाले जीवों के नाक के नीचे की खबर, इनके पास पहले थी, उन दोनों से। कान के ऊपर कैंची चलते हुए, निकट आ कर, न जाने ऐसा कौन सी खबर के पलीते में आग लगा दें, जिसका कोई अनुमान तक नहीं होगा आपको।

“जा रहे हो? या टाल रहे हो?” मम्मी काफी strong follow-up पर थी।

“जा रहा हूँ भाई। सलून में फ़ोन तो कर लेने दो।”

मेरी भोली माँ confusion भरी निगाह से मेरी तरफ देख रही थी। उसको लगा, सलून ही बोल रहा है न, की डॉक्टर बोल रहा है। लेकिन उसको क्या पता, की आजकल ऐसे ही मुँह उठाये आप सलून भी नहीं जा सकते। दूरियां आप अपने हिसाब से नहीं बढ़ा सकते, वो दोनों तरफ से बढ़ती हैं।

मैं सलून पहुंचा, अपने अपॉइंटमेंट के टाइम पर। मेरा हेयर specialist बस माथुर साहब की हेयर को special कर के फ्री ही हुआ था। Maintained आदमी हैं माथुर साहब भी, खुद इतने graceful की उम्र जब मिलने आयी तो और भी ग्रेस के साथ।

“मानना पड़ेगा माथुर साहब को। क्या बात है यार। क्या maintained रखा है खुद को!” मैंने कुर्सी पर बैठते अपने हजाम/ ठाकुर/hair specialist/ hair dresser/ hustler/ story-teller से कहा।

वो अचानक से मेरी कान के पास आ कर कहता है – “Maintained तो रहना पड़ेगा ही न, 304 वाली मालिनी मैडम के साथ फिल्म देखने जो जाना होता है हर Monday!”

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