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Sunday wala blog #9: Sunday wali Picnic

“अबे चिकन कटवा लेना, बोनलेस। और दही रख लेना। और सुन, चिकन मसाला और ginger garlic paste भी।”

ये पिछले आधे घंटे में मेरे ‘सीनियर मैनेजर’ दोस्त का तीसरा फ़ोन था। ऑफिस में तो भाईसाहब 5 वेंडर, 6 लोग और करोडो का बजट handle करते थे। लेकिन दोस्तों की पिकनिक मैनेज करना कोई ऐसी वैसी बात नहीं थी, ये उनको अब समझ आ रहा था।

“अच्छा, अनु बोल रही है उसके लिए पनीर ले लेने। और …”

चौथा फ़ोन।

भाईसाहब venue को set-up करने एक responsible manager की तरह वक़्त से पहले पहुँच गए थे, लेकिन वहां जा कर उनको realise हुआ की जितनी चीज़ें पैक हुई थी, उस से बहुत ज़्यादा होनी बाकी थी। कुछ लम्हे होते हैं ज़िन्दगी में, जब आपको अचानक समझ आता है की हाउस वाइफ, हमारे मम्मीयों के लिए कितना अनफेयर टाइटल था। अगर हाउसवाइफ होना एक कॉर्पोरेट प्रोफेशन होता, तो सिर्फ एक पिकनिक की management पर ही मम्मी को employee ऑफ़ the month मिल जाता।

चिकन, पनीर, बैडमिंटन, मसाला, दही और 56 और चीज़ें गाडी में डाल कर, मैं शहर के बाहर, झील के किनारे पिकनिक बनाने निकल गया। शहर के बाहर। जब से हमारे शहर बड़े हो गए हैं, शहरों में जगह कम हो गयी है। मुझे याद है, बचपन में हमारा पूरे शहर में एक zoo हुआ करता था, और पूरा शहर उसी एक zoo मेरा पूरा शहर पिकनिक मना लेता था। फिर भी एक कोना सुकून वाला बच ही जाता था, साइंस कॉलेज के उस कपल के लिए, जो प्यार के लिए जूलॉजी क़ुर्बान कर के आये थे।

मुझे याद है, बचपन में नए साल के आने की ख़ुशी के कारण अलग होते थे, और मनाने के तरीके भी। हमारा पूरा परिवार चिड़िया घर जाता था, नए साल की पिकनिक मानाने। हर साल जाड़े की छुट्टियों में, रिकशे, ऑटो, साइकिल और पैदल, सारे साधनो का उपयोग कर के पहुंचना पड़ता था। छोटे शहरों में परिवार बड़े होते हैं ना, क्या करें! 

मैं भी अपनी कार स्टार्ट कर चुका था, लिस्ट रास्ते से भी लम्बी हो चुकी थी, तो सोचा market ही चले चलते हैं, सब एक बार में खरीद लेंगे। बचपन में ये दिक्कत नहीं थी। मम्मी छोले बना लेती थी, भाभी पुलाव, और दीदी पूरियां। यहाँ इंडिपेंडेंट होने के नाम पर अदरक और लहसुन खरीद रहा हूँ मैं।

हमारे यहाँ चिड़ियाघर के बीचों बीच एक छोटी सी झील हुआ करती थी। बचपन में तो बड़ी सी हुआ करती थी, दुनिया देखने के बाद पता चलता है की झील भी छोटी थी और शहर भी। खैर, उस झील में चलती थी नाव, और नाव में सैर करने का बचपन का वो // एक्ससिटेमेंट और // डर के मिश्रण वाला एहसास भूले नहीं भूलता है।

एक बार की बात है, बोट का पेडल चलाते चलाते हम इतना आगे चले गए की थक कर बैठ गए और वापस आने पर overtime का fine भरना पड़ गया। पापा गुस्सा भी हुए थे। उस वक़्त ये बातें कितनी बड़ी हुआ करती थी। जी हाँ, उस वक़्त, जब ऑटो रिक्शा रिज़र्व कर के जाना अमीरो वाली बात होती थी।

मैं पिकनिक के रास्ते तो आगे बढ़ रहा था, मगर वक़्त में बहुत पीछे जाता जा रहा था। मैं अपने मन में, अपने बचपन में जा रहा था। अपनी संडे वाली पिकनिक में, जहाँ आज भी मैं सिर्फ इसलिए खुश हूँ क्यूंकि जाड़े की छुट्टियां हो गयी हैं। सभी मेरे अपने हैं। मेरे भाई और बहन अभी तक cousins नहीं बने हैं। जहाँ आज भी एक छोटी सी झील में पेडल वाली नाव है।

मुझे ऐसा लगता है, की हम अपनी असल ज़िन्दगी बचपन में जी चुके होते हैं, और सारी उम्र उस बचपन को वापस पाने में गुज़ार देते हैं। और मेरे हिसाब से ऐसा होना भी चाहिए। ज़िन्दगी का एक ही मक़सद होना चाहिए, की हम अपने आप का best version बन पाएं, और बचपन से best version हमारा, शायद ही कोई और हो पाएगा।

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